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छिंदा सिंह ने हुसैनीवाला बॉर्डर पर 40 साल के बाद आकर देखा तो बदली मिली नुहार

3 वर्ष पहले
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40 साल पहले यहां पर भर्ती करने आया था आज आकर देखा तो जगह की नुहार ही बदली पड़ी है। वर्षों से एक सपना था कि हुसैनी वाला में लगने वाला बैसाखी मेला देखूं पर आज सौभाग्य मिला है। यह कहना है हुसैनीवाला स्थित शहीदी स्मारक पर पहुंचे जीरा के 80 वर्षीय बुजुर्ग छिंदा सिंह का। मेले का सिलसिला बैसाखी से एक दिन पूर्व ही शुरू हो गया है। लोगों का हुजूम शुक्रवार से ही स्मारक स्थल पर उमड़ना शुरू हो गया है।

शहीदी स्मारक बनने के मेले का महत्व बढ़ा

मेले में पहुंचे जीरा के छिंदा सिंह ने बताया कि जब वह मजदूरी करता था तो इस जगह पर 40 वर्ष पूर्व उसे आने का मौका मिला था। तब वह स्मारक स्थल में मिट्टी की भर्ती करने आया था। उसके बाद बहुत इच्छा थी कि एक दिन इस स्थल पर लगने वाले बैसाखी के मेले को देखने जाऊं। आज यहां पर रौनक देखकर मन को बड़ी खुशी हुई है। पूरी स्मारक स्थल में दो घंटे तक घूमा हूं। शहीदी स्मारक बनने के बाद यहां के मेले का महत्व और बढ़ गया।

हालांकि बैसाखी का मेला शनिवार को है पर शुक्रवार को भी लोग शहीदी स्मारक पहुंचने लगे हैं। दरअसल मेला पहले 13 अप्रैल को लगता था इसलिए काफी लोग 13 अप्रैल को ही मेले में पहुंचते हैं। खाने-पीने की व खिलौनों की स्टालें आज से ही सजनी शुरू हो गई हैं। सतलुज के निकट शहीदी स्मारक पर शनिवार को बैसाखी का मेला लगेगा। इसको लेकर सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध किए गए हैं। शहीदी स्मारक से पूर्व सतलुज दरिया के किनारे मेला लगता था।

सतलुज में मात्र 645 क्यूसिक रहा पानी

सदियों से बैसाखी के दिन लोग हुसैनी वाला के निकट सतलुज के पत्तन पर स्नान करते आए हैं। हालांकि अब स्नान की परंपरा कम हो गई है पर इस पर्व का महत्व स्नान से ही है। इस बार शायद लोगों को बैसाखी का स्नान करने के लिए पानी भी नसीब न हो। इस दिन सतलुज दरिया में हजारों क्यूसिक पानी होता था पर आज मात्र 645 क्यूसिक पानी है। इतना पानी तो कलाली से भी बाहर नहीं आ पाएगा।

पंजाब माता की समाध पर श्रद्धांजलि देने के लिए जाती हुईंं छात्राएं।

बैैसाखी मेले से एक दिन पहले आए लोग बोट का आनंद लेते हुए।

देव समाज काॅलेज की छात्राएं स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने पहुंची।

जानकारी देता हुआ छिंदा सिंह।

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