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नौकरी खोने के डर और राजनीतिक दबाव में पंगु पुलिस कैसे करेगी सुरक्षा

3 वर्ष पहले
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एक नहीं अनेक बार एेसा देखने में आया है कि मारपीट या तोड़फोड़ की घटनाएं पुलिस की मौजूदगी में होती हैं और पुलिस उसको मूक दर्शक बनी देखती रहती है। इससे लोगों का पुलिस से भरोसा उठना स्वाभाविक है। पुलिस ऐसे ही अपना रवैया बरकरार रखेगी तो लोग सुरक्षा की उम्मीद करना भी छोड़ देंगे। पुलिस बार-बार मूक दर्शक बनकर उपद्रवियों के आगे घुटने टेक कहीं न कहीं अपनी मजबूरी भी बयां कर रही है।

राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक, व्यापारिक, किसान आदि संगठनों के धरने-प्रदर्शनों के दौरान जब लोग कानून हाथ में लेने को उतारू हो जाते हैं तो पुलिस उन पर तुरंत प्रभाव से एक्शन लेने से गुरेज करती है। इतना ही नहीं कोई एक महिला के साथ सरेआम मारपीट कर रहा है और पुलिस कर्मी तमाशा देखते रहें ये बात किसी के गले से नहीं उतर रही। शुक्रवार को सिविल अस्पताल में डॉ. कुशलदीप सिंह ने एक महिला को बालों से पकड़ कर घसीटा और मारपीट की। इस दौरान उसने महिला से गाली-गलोच भी की। इस घटना के दौरान फिरोजपुर पुलिस के 2 कर्मी मौजूद थे। उन्होंने कोई हरकत नहीं दिखाई। वे चाहते तो डॉक्टर को ऐसा करने से रोक सकते थे। पर उनकी हिम्मत नहीं पड़ी डॉक्टर को रोकने की। इससे जाहिर होता है कि पुलिस आम आदमी से थोड़ा सा भी कुछ हटकर है तो पुलिस को उसका डर रहता है। शुक्रवार काे सिविल अस्पताल में डॉक्टर द्वारा महिला से मारपीट के दौरान पुलिस कर्मी तमाशा देखते रहे। इसी प्रकार 10 अप्रैल को सामान्य श्रेणी द्वारा भारत बंद के दौरान फिरोजपुर में हुई हिंसक घटना को पुलिस देखते रही और उपद्रवी तोड़फोड़ और मारपीट करते रहे। 2 अप्रैल को एससी श्रेणी के आह्वान पर हुए भारत बंद के दौरान भी पुलिस का रवैया काफी जगह पर ऐसा ही देखा गया। बीते वर्ष की बात करें तो अगस्त माह में डेरा सच्चा सौदा सिरसा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को सजा सुनाए जाने के बाद हरियाणा और पंजाब में जो हालात उपजे थे उनमें भी पुलिस की भूमिका कुछ इसी प्रकार की देखी गई।

13 अप्रैल 2018
सिविल अस्पताल में पुलिस के सामने ही डॉक्टर ने महिला से मारपीट।

10 अप्रैल 2018 : पुलिस के सामने तोड़-फोड़
10 अप्रैल को सोशल मीडिया के जरिये सामान्य वर्ग के बुलाए बंद के दौरान फिरोजपुर में हुए उपद्रव में पुलिस की मौजूदगी में तोड़फोड़ हुई। (फाइल फोटो)

पुलिस को आगे आना चाहिए : सीआर कास्वां
सेवा निवृत्त आईजी सीआर कास्वां ने बताया कि पुलिस दोनों तरफ की कार्रवाई की चपेट में आ जाती है। एक्शन नहीं लेने पर उन्हें सस्पेंड जैसी सजा का सामना करना पड़ता है और एक्शन लेने पर मामला तूल पकड़ता है तो उसे जेल भी जाना पड़ता है। दोनों में जो कम सजा वाला ऑप्शन होगा उस पर कर्मी ध्यान देता है। उपद्रव के दौरान ड्यूटी मजिस्ट्रेट लिख कर दे तो उसके बाद फोर्स का प्रभारी एक्शन के आदेश देता है पर ऐसा कम ही हो पाता है कि ड्यूटी मजिस्ट्रेट एक्शन के लिए लिखित रूप में देते हों। भीड़तंत्र की सुनवाई राजनीतिक लोग भी करते हैं तो पुलिस को उनसे भी बचना पड़ता है। बात रही पुलिस की मौजूदगी में डॉक्टर द्वारा महिला की पिटाई करने की इस मामले में पुलिस कर्मियों को आगे आना चाहिए था। घटना के बाद होनी वाली विभागीय जांच का डर भी पुलिस कर्मी को हमेशा सताता रहता है।

2 अप्रैल 2018
2 अप्रैल को बंद के दौरान रेलवे स्टेशन पर मूकदर्शक बने पुलिस कर्मी।

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