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इबादत में डूब जाएगा शहर, बदल जाएगी दिनचर्या

3 वर्ष पहले
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रमजान के मुबारक महीने का चांद दिखाई देने पर 17 मई से रोजे शुरू होंगे। यदि चांद 16 को नजर आ गया तो रात से ही तरावीह की विशेष नमाज अदा की जाएगी। रमजान माह को लेकर शहर में तैयारियां शुरु हो गई हैं। चांद नजर आते ही शहर का बड़ा हिस्सा इबादत में डूबा नजर आएगा। मस्जिदों में नमाजियों की भीड़ बढ़ जाएगी। इबादत में ज्यादा से ज्यादा समय दे सकें इसके लिए लोगों ने सामान की खरीदारी अभी से शुरु कर दी है, वहीं इफ्तार और सहरी में खाने-पीने के कई सामान बाजार में है। इनमें खजूर की मांग सबसे ज्यादा है।

चांद नजर आने के बाद तीस दिन रोजे रखे जाएंगे। रमजान की तैयारी के लिए उलेमाओं ने लोगों को हिदायत दी है। रमजान का महीना रहमत और बरकत का माना जाता है। इस महीने में अल्लाह ने पवित्र कुरान नाजिल किया था। यदि इंसान ईमानदारी से रोजे रखे तो अल्लाह उसके पिछले गुनाहों को माफ कर देता है और इंसान को बुराइयों से बचाता है।

जामा मस्जिद के पेश इमाम खलीक अहमद कासमी के मुताबिक सुबह सहरी, शाम को इफ्तार करने का नाम रोजा रखना नहीं है। बुरी आदतों से तौबा करने को रोजा कहते है। उन्होंने बताया कि न जुबां से किसी को बुरा कहें, न दिमाग में कोई बुराई उपजे, न ही कान से किसी की बुराई सुने और न उस तरफ कदम बढ़ाएं जो बुराई की तरफ ले जाता हो। इन सभी का पालन करना सही मायने में रोजा है, लोग इनका एहतराम करें।

क्या है रोजा

रमजान का पवित्र माह फिजा में इबादत और इनायत का खूबसूरत तालमेल सजा रहा है। रोजा का अर्थ तकवा है। इंसान रोजा रख कर अपने आप को ऐसा इंसान बनने की कोशिश करता है, जैसा उसका रब चाहता है। तकवा यानी अपने आप को बुराइयों से बचाना और भलाई को अपनाना है। रोजा केवल भूखे प्यासे रहने का नाम नहीं कहा जाता है, रोजा इंसान के हर एक भाग का होता है। कासमी ने बताया कि एक रोजा भी बगैर किसी कारण छोड़ दे तो वह पूरी जिंदगी रोजा रख कर भी उस एक रोजा का सबाब नहीं पा सकता है। इफ्तार रोजे पूरे होने का वक्त तब होता है जब सूरज डूबता है।

इस रमजान हो सकते हैं 5 शुक्रवार

इबादत को ये महीना तो वैसे ही खास है लेकिन इस बार ये और भी खास बन सकता है। दरअसल इस बार पांच शुक्रवार यानि जुमा इस माह हो सकते हैं। अगर तीस रोजे पूरे हुए तो जुमातुल विदा पर ये महीना खत्म होगा। शनिवार को ईद होगी।

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