ज्यादातर रोजे 15 घंटे के, रमजान को लेकर बच्चों में उत्साह
भास्कर न्यूज | गंगापुर सिटी
करीब तीस बरस बाद मई माह में रमजान आया है। पारा 44 डिग्री के आस-पास है और दिन लंबे होने से रोजे की अवधि भी करीब 15 घंटे से अधिक की रहेगी। अधिकांश रोजे इसी अवधि में आएंगे। हालांकि मुस्लिम समुदाह के लोगों में इसे लेकर चिंता नहीं है। रमजान में सुबह सेहरी का वक्त चार बजे के आस पास व इफ्तार का वक्त शाम को सात बजकर 8 मिनट के आस-पास का है। सामान्य चिकित्सालय के डॉ. आर.सी. मीणा के अनुसार गर्मी में रोजे करने पर कई सारी सावधानियां रखनी होती हंै। उन्होंने बताया कि गर्मी में सेहरी और इफ्तार में खानपान में सावधानियां रखनी होगी। इसके तहत सेहरी के समय हल्का खाना लें, दही या छाछ, रायते, नींबू पानी का सेवन जरुर करे। जिन लोगों को डायबिटीज नहीं है वह एक गिलास ग्लूकोज लें। तली हुई चीजों से बचें। ओआरएस का घोल भी ले। इसी तरह इफ्तार के समय खजूर और फल से रोजा इफ्तार करंे। इफ्तार के एक से डेढ़ घंटे बाद खाना खाएं। रोजेदार बच्चों का भी खान-पान में ध्यान रखा जाए।
अगले साल भी मई में आएंगे रोजे
रमजान का मुबारक महीना 2019 में मई के शुरु सप्ताह के दिनों में ही शुरु हो जाएगा। उसके बाद 2020 में अप्रैल माह में रोजे रखे जाएंगे। अप्रेल माह में गर्मी कम पड़ने से रोजेदारों को रोजा रखने में राहत मिल सकेगी। शहर में रमजान की रौनक छा गई। तीसरे रमजान पर लोगों में उत्साह नजर आया। शहर&ठ्ठड्ढह्यश्च; की विभिन्न स्थित मस्जिदों में अकीदतमंदों की भीड़ उमड़ी। सुबह से शाम तक इबादत का दौर चला। शाम को रोजेदारों ने सामूहिक रूप में बैठकर रोजा इफ्तार किया गया। इसके बाद मगरिफ की नमाज अदा कर अमन चैन की दुआ मांगी गई।
विशेष परिस्थितियों में जीना सिखाता है रमजान
रमजान को इबादत का महीना करार दिया गया है। इस माह की हर इबादत को 70 दरजा सवाब हासिल है अर्थात इसमें किए गए पुण्यों व इबादत का फल 70 गुना अधिक मिलता है। यह माह इंसानियत के लिए पैगाम है। इस माह अपनी ख्वाहिशों को कम करते रखते हुए जकात का एक तरीका हुजूर की सुन्नतों की पैरवी करता है। रोजा सब्र का पाठ भी पढ़ाता है। एक माह के रमजान रूपी प्रशिक्षण काल में उन चीजों से दूर रहकर उन्हें हमेशा के लिए छोड़ना आसान हो जाता हंै, जिनके हम आदी हो गए हंै।
रमजान में रोजा रखने का एक फायदा यह भी हंै कि पाचन तंत्र को आराम मिलता है। यह माह शरीयत के मुताबिक जिंदगी बसर करने की बेहतर कोशिश है। भूखे-प्यासे रहकर रोजा रखना विशेष परिस्थितियों में जीना सिखाता है। बच्चों में भी जिंदगी को सही मायने में जीने का जज्बा पैदा हो जाता है।