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मांडना लोककला पर 1000 चित्र उकेरे, शोध कर बनाया वर्ल्ड िरकॉर्ड

3 वर्ष पहले
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मालवा की लोककला मांडना को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए 6 साल से शामगढ़ की वंदना शिवहरे प्रयासरत हैं। इस पर वे किताबें लिखने के साथ देश में कई जगह कला का लोहा मनवा चुकी हैं। वर्तमान में वंदना की सबसे बड़ी उपलब्धि कार्य और शोध को वज्र वर्ल्ड रिकाॅर्ड टेक्सास (यूएस) बुक में स्थान मिलना है। इसके पहले सुवासरा क्षेत्र के संभव डपकरा को शंख वादन में स्थान मिला था। वंदना इन दिनों मंदसौर में शिवना नदी के घाट पर टीम के साथ मांडला कला से चित्र उकेर रही हैं।

मांडना कला का सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व है। वर्तमान में लोग इसको भूलते जा रहे है। यह कला लुप्त न हो जाए, इसके लिए शामगढ़ रहने वाली और शिवपुरी की बहू वंदना (जायसवाल) शिवहरे प्रयासरत हैं। उन्हें इस काम में सफलता भी मिली है। आज सृजन संस्था कई उभरते कलाकारों को मौका देने के साथ पुराने कलाकारों को भी वे प्लेटफाॅर्म दे रही है। वंदना ने शामगढ़ व शिवपुरी सहित कई शहरों में कला के प्रचार-प्रसार के लिए कार्यशाला की है। शोध व कार्य को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने के लिए प्रयास शुरू किए। वज्र विश्व रिकॉर्ड टेक्सास (यूएस) के लिए इस वर्ष के शुरू में आवेदन किया। मार्च 2018 में उनका चयन हुआ और मालवा क्षेत्र की ‘परंपरागत और सांस्कृतिक लोक कला मांडना चित्रकला’ कैटेगरी में नया वज्र विश्व रिकॉर्ड बनाया।

कला को जानने के लिए गांव-गांव किया भ्रमण, पुस्तकंे प्रकाशित कराईं, प्रशिक्षण देने के लिए कार्यशालाएं की

मंदसौर में शिवना नदी के घाट पर मालवा की मांडला कला के चित्र उकेरती वंदना शिवहरे।

क्षेत्र से दूसरा रिकाॅर्ड, पहला शंख वादन में बना

गरोठ-शामगढ़-सुवासरा क्षेत्र की बात करें तो वज्र वर्ल्ड रिकाॅर्ड टेक्सास (यूएस) बुक में क्षेत्र का यह दूसरा रिकाॅर्ड हैं। इसके पहले सुवासरा के संभव पिता विवेक डपकरा को जूनियर कैटेगरीाया था। संभव के नाम 26 सेकंड तक लगातार शंख बजाने का वर्ल्ड रिकाॅर्ड हैं।

शामगढ़ के समाजसेवी स्व. गोवर्धनलाल जायसवाल बेटी वंदना को बचपन से ही मांडने का शौक था। इसकी प्रेरणा भी परिजन से मिली। घर सहित जहां मौका मिलता मांडने उकेरने लग जाती। 2002 में शिवपुरी में संजय शिवहरे से शादी के बाद सब कुछ बंद हो गया। 2011 में गर्मी की छुट्टी में आई तो फिर से मन कला में लगा। माता-पिता ने हौसला बढ़ाया तो लुप्त होती कला को बचाने के लिए 2012 में मांडना चित्रों को कागज पर उकेर कर संरक्षित करना शुरू किया। उसके बाद शामगढ़ व आस-पास के कई गांवों का भ्रमण किया और दो साल की मेहनत से 1 हजार से ज्यादा मांडना चित्र तैयार किए। जन-जन तक कला को पहुंचाने के लिए किताबें प्रकाशित करवाईं आैर प्रशिक्षण देने के लिए कार्यशालाएं शुरू की। इस आधार पर रिकाॅर्ड बना। आज सृजन संस्था के माध्यम से 100 से ज्यादा कलाकारों काे तैयार कर चुकी हैं। कुछ कलाकार उनके साथ टीम में शामिल होकर कार्य करते हैं। वंदना कहती हैं नए कलेवर के साथ नए रंगों के साथ फिर से लाया जाए तो शहरों में भी इसे सम्मान मिलेगा। आज वह यही कर रही हैं और लोग पंसद करते हैं। इस कला में सूरज, चांद, मयूर, हाथी, स्वास्तिक, ओम, फूल पत्ती का मांडनों में खास उपयोग होता है।

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