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श्रद्धाभाव के साथ मना अखंड सुहाग प्राप्ति का महापर्व, वट वृक्ष के नीचे की गई पूजा

3 वर्ष पहले
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भास्कर न्यूज | घाटशिला - मुसाबनी

अनुमंडल के विभिन्न इलाके में अखंड सुहाग प्राप्ति का महापर्व वट सावित्री महिलाओं ने पूरे श्रद्धाभाव से मनायी। इस मौके पर उपवास रखकर महिलाओं ने वटवृक्ष के नीचे सामूहिक रूप से पूजा अर्चना कर दीर्घ सुखद वैवाहिक जीवन की कामना की। शहर के अलावे आसपास के इलाके में भी महिलाओं ने विधि विधान के साथ पूजा की। शहर के फूलडुंगरी, काशिदा, मऊभंडार, गोपालपुर और दाहिगोड़ा मंदिर में भी पूजा के लिए महिलाओं की भीड़ जुटी रही। सुहागिनों ने वट वृक्ष के नीचे मिट्टी की बनी सावित्री और सत्यवान तथा भैंसे पर सवार यम की प्रतिमा स्थापित करते हुए वट वृक्ष की जड़ में पानी दिया। इस दौरान जल, मौली,रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल तथा धूप से पूजा अर्चना की। जल से वट वृक्ष को सींचकर तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार परिक्रमा की गई।

मुसाबनी: विभिन्न मंदिरों में महिलाओं ने अपने -अपने पति के लंबी उम्र और अपने अखंड सुहाग के लिए वट वृक्ष के नीचे बैठ कर वट सावित्री की पूजा की गई। मुसाबनी के शिव मंदिर न 1, विश्वनाथ मंदिर मुसाबनी 3, न्यू कॉलोनी महाकालेश्वर मंदिर आदि जगहों पर सुबह से ही महिलाएं सज धज कर पूजा अर्चना को पहुंचने लगी थी। भक्ति भाव से महिलाओं ने अपने अखंड सुहाग के लिए पूजा अर्चना किया। पति की लंबी आयु के लिए बरगद के पेड़ तले सत्यवान और यमराज की पूजा कर कच्चे धागे से पेड़ की फेरी लगायी। इसके बाद घर पहुंचकर महिलाओं ने पति का आशीर्वाद लिया।और अपना व्रत पूरा किया। इस अवसर पर पंडितों द्वारा वट सावित्री कथा का पाठ किया गया। महिलाओं ने कथा सुनी।इस व्रत के बारे में पंडित सीताराम पंडित ने बताया की ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या तिथि को हिन्दू महिलाएं वट सावित्री का व्रत रखती हैं । शास्त्रों के अनुसार इस दिन व्रत रखकर वट वृक्ष के नीचे सावित्री, सत्यवान और यमराज की पूजा करने से पति की आयु लंबी होती है और संतान सुख प्राप्त होता है।

मुसाबनी - कथा सुनाते पंडित सीता राम जोशी

इधर, सिंदूर खेलकर महिलाओं ने मनाया वट सावित्री पर्व

भास्कर न्यूज | श्यामसुन्दरपुर

गुड़ाबांदा प्रखण्ड अन्तर्गत भालकी गांव की सुहागिनों ने वट सावित्री की पूजा की। पुजारी यदुनाथ बोड़ाल ने पूजा अर्चना की। पूजा के उपरांत महिलाएं सिंदुर खेलकर खुशियां मनायी। मौके पर रुमा मन्डल, कल्याणी मन्डल, वर्षा पातर, द्रौपदी मन्डल, उषा पातर, राखी मन्डल, पूजा मन्डल आदि उपस्थित थी।

घाटशिला और आसपास के मंिदरों में दिनभर जुटी रही भीड़ महिलाओं ने पूरे दिन रखा उपवास

अखंड सौभाग्य के लिए होती है पूजा

वट सावित्री के दिन बट वृक्ष की पूजा दीर्घायु सुहाग यानि अखंड सौभाग्यवती के लिए की जाती है। अमावस्या के दिन बांस की टोकरी लें उसमें से सप्त धान, गेहूं, चावल, तेल, कांगनी और श्यामक आदि भर लें और उनमें से एक पर ब्रह्मा और सावित्री कथा दूसरी टोकरी में सत्यवान और सावित्री की प्रतिमा स्थापित करें यदि इनकी प्रतिमाएं आपके पास नहीं है तो मिट्टी की प्रतिमा बनाई जा सकती है। अब वट वृक्ष के नीचे बैठ कर पहले ब्रह्मा सावित्री और फिर सत्यवान सावित्री का पूजन करें सावित्री के पूजन में सौभाग्य की वस्तुएं काजल, मेहंदी, चूड़ी, बिंदी, वस्त्र, आभूषण और दर्पण इत्यादि चढ़ाएं, तथा वटवृक्ष का पूजन करें। पूजन करने के बाद वट की जड़ों में जल चढ़ायें। अब वृक्ष के तने पर 50 फुट के करीब कच्चा सूत 108 बार लपेटने का विधान है। यदि इतना ना कर सकें तो न्यूनतम 7 बार तो परिक्रमा करनी ही चाहिए। अंत में वट सावित्री व्रत की कथा सुननी चाहिए।

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