तब गुमला, रांची जिला का अंग हुआ करता था। आबादी कम थी। लोग उतने शिक्षित नहीं थे। उस समय चंद गलियों में सिमटे गुमला में गिने चुने पक्के मकान थे। सुविधाएं कम थी। मगर सपने बड़े थे। विकास के पथ पर गुमला को आगे ले जाने के लिए लोगों में जोश था, दृढ़संकल्प था। लोगों के प्रयास व आंदोलनों के बाद (18 मई 1983 को) गुमला जिला बना। आज इतने सालों (35 साल) में कई मायनों में गुमला आगे बढ़ा। स्वास्थ्य, शिक्षा समेत अन्य सुविधाओं की राह पर हमारे कदम काफी आगे बढ़े।
खेल के क्षेत्र में हमने मुकाम हासिल किया, तो शिक्षा का स्तर भी ऊंचा हुआ। हायर एजुकेशन के मामले में उचित प्लेटफार्म के अभाव के बाद भी यहां के छात्र-छात्राएं विदेशों में नौकरी, पढ़ाई कर व सफलता प्राप्त कर गुमला को गौरवान्वित करते रहे हैं। व्यापार का साधन भी बढ़ा। बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हुई। वर्तमान में चिरलंबित मांग बाइपास पर काम चल रहा है। शहर में दो शॉपिंग मॉल भी खुल चुके हैं।
इसके अलावा दो-तीन मॉलों पर काम चल रहा है, जो निकट भविष्य में पूरा हो जाएगा। जबकि यहां के वीर सपूतों कीे बदौलत गुमला की पहचान देश भक्तों की भूमि के रूप में भी होती रही है। लेकिन फिर भी इतने सालों के बाद भी सपनों के गुमला का सपना अधूरा सा रह गया है। जिला बनने के बाद यहां पलायन, बेरोजगारी, क्राइम, हयूमन ट्रैफिकिंग, लूट, भ्रष्टाचार जैसे मामलों का ग्राफ भी तेजी से बढ़ा है। जो गुमला की पहचान को दागदार करती रही है। अब स्वच्छ व विकसित गुमला के लिए सभी को मिलकर प्रयास करने की जरूरत है। जिससे गुमला की पहचान एक मिसाल के रूप में कायम रहे।