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अपनी जवाबदेही से बचने के लिए डीएसई की ओर से दी गई भ्रामक जानकारी

3 वर्ष पहले
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गुमला के आरटीआई कार्यकर्ता आनंद किशोर पंडा ने आरटीआई के माध्यम से शिक्षा अधिकार से संबंधित सूचना मांगी थी। जो डीएसई के माध्यम से मिलने पर उन्होंने इस पर असंतोष प्रकट किया है। कहा कि निजी स्कूलों पर कार्रवाई सुनिश्चित नहीं कर जवाबदेही से बचने वाला जवाब दिया गया है।

इस मामले को अब झारखंड राज्य सूचना आयोग व राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग में ले जाया जाएगा। उन्होंने कहा कि गुमला में शिक्षा अधिकार कानून 2009 का अनुपालन हो रहा है। गैर मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों से संबंधित किसी प्रकार की शिकायत डीएसई कार्यालय में अप्राप्त है। स्कूलों द्वारा मनमानी बच्चों के शुल्क वृद्धि, री-एडमिशन के नाम पर अनावश्यक शुल्क, किताब-कॉपी सहित अन्य संबंधित किसी प्रकार की कोई शिकायत डीएसई को नहीं मिली है। इस बात की लिखित सूचना आरटीआई के तहत प्राप्त हुई है।

इसमें डीएसई द्वारा यह दिखाया गया है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की नियमावली के तहत जिले के निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत बीपीएल बच्चों का नामांकन आवेदन प्राप्त होने पर सुनिश्चित किया जाता है। जिले के तमाम निजी व सरकारी स्कूलों जहां कक्षा एक से 8 तक की पढ़ाई होती है। वहां बच्चों की सुरक्षा के लिए चहारदीवारी, पेयजल, वर्ग कक्ष, अलग अलग शौचालय, ग्राउंड आदि के लिए सर्व शिक्षा अभियान से कार्य किया जा रहा है। डीएसई द्वारा सूचना में यह भी दर्शाया गया है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों को भरने की जिम्मेवारी स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग झारखंड सरकार की है। इधर सूचना प्राप्त होने के बाद पंडा ने कहा है कि जिले में 250 से अधिक निजी स्कूल संचालित हैं। वहीं हजारों प्राथमिक व मवि हैं। लेकिन डीएसई आरटीआई एक्ट के नोडल पदाधिकारी होने के बावजूद भी इस एक्ट के मानक व मापदंडों के अनुरूप संचालित नहीं होने वाले निजी व सरकारी स्कूलों पर कार्रवाई सुनिश्चित नहीं कर जवाबदेही से बचने के लिए भ्रामक करने वाली सूचनाएं लिखित रूप से दी है।

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