संल्लेखना विषाद का नहीं, हर्ष का विषय: निर्णय सागर
सकल दिगंबर जैन समाज ने महाकवि दादागुरु आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज का 46वां समाधि दिवस भक्तिभाव से मनाया। इस मौके पर स्थानीय चौधरी मोहल्ला स्थित पाश्र्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर पर मुनिद्वय निर्णय सागरजी एवं पदम सागरजी महाराज के सानिध्य में कार्यक्रम हुआ। इसमें मुनि निर्णय सागरजी महाराज ने कहा कि संल्लेखना विषाद का नहीं हर्ष का विषय है। समाधिपूर्वक मरण करना मानवभव की सार्थकता है। आचार्य ज्ञानसागरजी मुनिराज ने स्वयं अपने शिष्य आचार्य विद्यासागरजी महाराज को आचार्य पद सौंपकर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया और संल्लेखना का निवेदन किया। आचार्य ज्ञानसागरजी ने पंडित भूरामल की अवस्था में संस्कृत भाषा के पांच महाकाव्य लिखकर भारतीय एवं जैन साहित्य को समृद्ध किया। उन्होंने ही आचार्य विद्यासागरजी महाराज को अष्ट सहस्त्री जैसे महान ग्रंथों का अध्ययन कराया। ज्ञानसागरजी ग्रंथ आचार्यश्री को दे दिया करते थे और स्वयं मुखाग्र गथाओं का उच्चारण कर पढ़ाया करते थे। मुनि पदम सागरजी महाराज ने कहा कि आचार्य ज्ञानसागरजी ने आचार्य विद्यासागर रूपि एक ऐसा दीप प्रज्जवलित किया जो सैकड़ों दीपकों को प्रज्जवलित कर जगत को धर्ममय प्रकाश से प्रकाशित कर रहा है। हम सभी आचार्य ज्ञानसागरजी के परम उपकार के प्रति सदैव कृतज्ञ रहेंगे। ब्रह्मचारी पवन कठ्रया ने कहा कि आज आचार्य विद्यासागरजी पपौराजी में ज्ञानसागर जी महाराज के साहित्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठी चल रही है।
इसमें साहित्य के मर्मग अपना आलेख प्रस्तुत करेंगे। आपका साहित्य अनुपम है। समाज के आनंद जैन शिक्षक ने बताया कि कार्यक्रम का संचालन अनिल बड़कुल ने किया। वहीं मंगलाचरण प्रतिभास्थली की बहन सोनल ने किया। कार्यक्रम के आरंभ में आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज की अष्ट द्रव्य से पूजन की गई। पूजन का सुंदर गायन बहन सलोनी दीदी व अन्य पाठशाला की दीदियों ने किया। वर्ष 2013 में भारत सरकार द्वारा आचार्य ज्ञान सागरजी महाराज के जीवन पर डाक टिकट जारी किया था। कार्यक्रम में संजीव जैन, कमेलश जैन, राजीव जैन, जितेन्द्र जैन, चंचल जैन सहित सैकड़ों जन उपस्थित थे।