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इनोवेशन के सामने कोई चुनौती बड़ी नहीं

3 वर्ष पहले
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जब गुजरात के वडोदरा में मैं बड़ा हो रहा था तो मेरे माता-पिता मुझे और मेरी बहन को हर रविवार को चिड़ियाघर (जू़) ले जाते थे। मंै सेंचुरी एशिया और क्लब मैग्जि़न भी घंटों पढ़ा करता था। इस तरह वन्यजीवों और पर्यावरण के प्रति मेरी रुचि जागृत हुई। मैं किसी प्राणी संग्रहालय या राष्ट्रीय उद्यान में अधिकारी बनना चाहता था। मुझे यह कहना होगा कि मेरे पैरेंट्स ने बहुत जल्दी ही मेरे भीतर पर्यावरणवाद का बीज बो दिया था। अब जब मैं ऊर्जा के क्षेत्र मंें काम कर रहा हूं तो मैं इसे भूल नहीं सकता।

काम के संबंध में मेरी धारणा यह है कि मैं जोड़ने वाले अथवा किसी पहल को सक्रिय करने वाले की भूमिका निभा सकूं ताकि दुनिया के भले के लिए भागीदारी संभव हो सके। फिर मैं संवेदना से संचालित व्यक्ति हूं। यह एेसी चीज है, जिसे बचपन से बढ़े होते हुए जो अनुभव मिलते हैं उनमें से उसे ग्रहण किया जाता है। यह सब सुनते-पढ़ते हुए किसी फलसेफ की बात ही लगती है लेकिन, जुनून किस तरह साकार होता है उसका अनुभव सुनाता हूं। पर्यावरण की दिशा में मैंने 2008 में युवाअों के नेतृत्व वाला संगठन इंडियन युथ क्लाइमेट नेटवर्क बनाया था। इसके मार्फत हमने 2009 में ‘क्लाइमेट सॉल्यूशन रोड टूअर’ आयोजित किया था। ‘रेवा’ से किया जाने वाला सफर इसका हिस्सा था।

‘आपके पास बिजली से चलने वाले वाहन को चार्ज करने की व्यवस्था है?’ आंध्र प्रदेश के ग्रामीण अनंतपुर जिले के पेट्रोल पम्प मैनेजर देव रेड्‌डी ने मुझे ऐसे देखा जैसे वे समझ रहे हों। यह 2008 की बात है, जब देश के ज्यादातर लोगों ने बिजली से चलने वाली कार के बारे में सुना भी नहीं था। लेकिन बिना झिझके वे मुझे एक शेड के नीचे ले गए और बड़ा-सा प्लग पॉइंट दिखाया। इसका इस्तेमाल गन्ने का रस निकालने वाली मशीन के लिए होता था। मैं देखते ही समझ गया कि यह उस रेवा वाहन की बैटरी को चार्ज करने के लिए काफी है, जिसमें मैं और मेरे दोस्त भारतभर में 3,500 किलोमीटर का सफर करने वाले थे। तब यह सोचना कि जलवायु परिवर्तन के संकट के लिए भारत कोई नया टेक्नोलॉजी समाधान खोज लेगा, निरर्थक था। 40 करोड़ लोगों तक तो बिजली ही नहीं पहुंची थी। लेकिन, दस साल में यह सब बदल गया है। अब भारत अक्षय ऊर्जा में लीडर है।

रेड्‌डी के प्लग ने अच्छा काम किया। मैं और मेरे दोस्त जैव डीजल से चलने वाला ट्रक, बेकार वनस्पति तेल से चलने वाला कामचलाऊ घर जैसे वाहन और न्यूयॉर्क का सौर ऊर्जा से संचालित रॉकबैंड लेकर चेन्नई से नई दिल्ली तक जा पाए। इसे अमेरिकी विदेश मंत्रालय व भारत के अक्षय ऊर्जा मंत्रालय ने प्रायोजित किया था।

चालीस दिन की यात्रा में हम चेन्नई, वेल्लौर, बेंगलुरू, हैदराबाद, जयपुर, अहमदाबाद आदि पंद्रह शहरों में रुके और आखिर में दिल्ली पहुंचे। हम भारतीय और अमेरिकी युवाओं के मिश्रित समूह थे। आरईवीए (रेवा) द्वारा निर्मित बिजली से चलने वाले वाहनों के तीन काम चलाऊ मॉडल हमारे साथ थे। हर 120 किमी पर हमें बैटरी चार्ज करनी पड़ती थी, कुछ जगहों पर चार्जिंग पॉइंट में फेरबदल भी करना पड़ा था पर बिजली के अभाव वाले उन दिनों में भी हमें बहुत दिक्कत नहीं आई। मैं राजस्थान, उत्तराखंड और कर्नाटक में दूरवर्ती गांवों में गया। जहां ग्रिड थी वहां भी रोज 12-14 घंटे बिजली गायब रहती। न हेल्थ क्लिनिक चल पाते, न बच्चे पढ़ पाते।

2008 में ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका व भारत ने प्रगत स्वच्छ ऊर्जा भागीदारी (पेस) शुरू किया, जिसका मुख्य बिंदु ही मिलकर शोध व विकास करना था। दोनों देशों के वैज्ञानिक व उद्योग सौर ऊर्जा, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और जैव ईंधन पर काम करने के लिए साथ आए। प्रधानमंत्री मोदी गुजरात में अक्षय ऊर्जा की टेक्नोलॉजी लागू करने के प्रयोग कर चुके थे। जलवायु परिवर्तन पर एक किताब भी लिख चुके हैं। अब 2022 तक 20 गीगा वॉट सौर ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य पर्याप्त नहीं लगता था और उसी साल इस लक्ष्य को पांच गुना कर दिया गया। फिर तो 2030 तक सारे बिजली से चलने वाले राष्ट्रीय वाहन जैसे लक्ष्य तय हो गए।

हाल ही में मैंने भारत की 13 राजधानियों से होकर सफर किया और देखा कि आखिरकार पावर सरप्लस की स्थिति आ गई है। ऐसा नहीं कि हर व्यक्ति तक बिजली पहुंच गई है लेकिन, 2012 की गर्मी में ब्लैक आउट से 60 करोड़ लोगों को बिजली न मिलने की स्थिति से यह बहुत बेहतर है। भारतीय राज्य इनोवेशन के सेंटर बन गए हैं। कर्नाटक ने बिजली के वाहन और बैटरी स्टोरेज पर नीति बना ली है। वह नए बैटरी स्टोरेज इनोवेशन सेंटर, राज्यभर में चार्जिंग का ढांचा बनाने और ट्रेनिंग देकर इलेक्ट्रिक आॅटो टेक्निशियन की फौज तैयार करेगा। ओडिशा ने ऐसा कॉल सेंटर बनाया है, जो ग्राहकों की छत पर लगे सौर उर्जा उपकरणों की समस्याएं दूर करेगा। मिसौरी से महाराष्ट्र व कैलिफोर्निया से तमिलनाडु तक चुनौती एक ही है। व्यापक रूप से उपलब्ध अक्षय ऊर्जा को पहले ही अत्यधिक दबाव में आई ग्रिड से जोड़ना और नई पावर टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करना ताकि इस जटिल तंत्र का उचित प्रबंधन किया जा सके। हम तो बिजली के घोर संकट के दिनों में बिजली के वाहन चला पाए। कल्पना कीजिए कि आज क्या कुछ किया जा सकता है! @KartikeyaSingh

कार्तिकेय सिंह

डेप्यूटी डायरेक्टर, वाधवानी चेयर, यूएस-इंडिया पॉलिसी स्टडी,सीएसआईएस, वॉशिंगटन

जब गुजरात के वडोदरा में मैं बड़ा हो रहा था तो मेरे माता-पिता मुझे और मेरी बहन को हर रविवार को चिड़ियाघर (जू़) ले जाते थे। मंै सेंचुरी एशिया और क्लब मैग्जि़न भी घंटों पढ़ा करता था। इस तरह वन्यजीवों और पर्यावरण के प्रति मेरी रुचि जागृत हुई। मैं किसी प्राणी संग्रहालय या राष्ट्रीय उद्यान में अधिकारी बनना चाहता था। मुझे यह कहना होगा कि मेरे पैरेंट्स ने बहुत जल्दी ही मेरे भीतर पर्यावरणवाद का बीज बो दिया था। अब जब मैं ऊर्जा के क्षेत्र मंें काम कर रहा हूं तो मैं इसे भूल नहीं सकता।

काम के संबंध में मेरी धारणा यह है कि मैं जोड़ने वाले अथवा किसी पहल को सक्रिय करने वाले की भूमिका निभा सकूं ताकि दुनिया के भले के लिए भागीदारी संभव हो सके। फिर मैं संवेदना से संचालित व्यक्ति हूं। यह एेसी चीज है, जिसे बचपन से बढ़े होते हुए जो अनुभव मिलते हैं उनमें से उसे ग्रहण किया जाता है। यह सब सुनते-पढ़ते हुए किसी फलसेफ की बात ही लगती है लेकिन, जुनून किस तरह साकार होता है उसका अनुभव सुनाता हूं। पर्यावरण की दिशा में मैंने 2008 में युवाअों के नेतृत्व वाला संगठन इंडियन युथ क्लाइमेट नेटवर्क बनाया था। इसके मार्फत हमने 2009 में ‘क्लाइमेट सॉल्यूशन रोड टूअर’ आयोजित किया था। ‘रेवा’ से किया जाने वाला सफर इसका हिस्सा था।

‘आपके पास बिजली से चलने वाले वाहन को चार्ज करने की व्यवस्था है?’ आंध्र प्रदेश के ग्रामीण अनंतपुर जिले के पेट्रोल पम्प मैनेजर देव रेड्‌डी ने मुझे ऐसे देखा जैसे वे समझ रहे हों। यह 2008 की बात है, जब देश के ज्यादातर लोगों ने बिजली से चलने वाली कार के बारे में सुना भी नहीं था। लेकिन बिना झिझके वे मुझे एक शेड के नीचे ले गए और बड़ा-सा प्लग पॉइंट दिखाया। इसका इस्तेमाल गन्ने का रस निकालने वाली मशीन के लिए होता था। मैं देखते ही समझ गया कि यह उस रेवा वाहन की बैटरी को चार्ज करने के लिए काफी है, जिसमें मैं और मेरे दोस्त भारतभर में 3,500 किलोमीटर का सफर करने वाले थे। तब यह सोचना कि जलवायु परिवर्तन के संकट के लिए भारत कोई नया टेक्नोलॉजी समाधान खोज लेगा, निरर्थक था। 40 करोड़ लोगों तक तो बिजली ही नहीं पहुंची थी। लेकिन, दस साल में यह सब बदल गया है। अब भारत अक्षय ऊर्जा में लीडर है।

रेड्‌डी के प्लग ने अच्छा काम किया। मैं और मेरे दोस्त जैव डीजल से चलने वाला ट्रक, बेकार वनस्पति तेल से चलने वाला कामचलाऊ घर जैसे वाहन और न्यूयॉर्क का सौर ऊर्जा से संचालित रॉकबैंड लेकर चेन्नई से नई दिल्ली तक जा पाए। इसे अमेरिकी विदेश मंत्रालय व भारत के अक्षय ऊर्जा मंत्रालय ने प्रायोजित किया था।

चालीस दिन की यात्रा में हम चेन्नई, वेल्लौर, बेंगलुरू, हैदराबाद, जयपुर, अहमदाबाद आदि पंद्रह शहरों में रुके और आखिर में दिल्ली पहुंचे। हम भारतीय और अमेरिकी युवाओं के मिश्रित समूह थे। आरईवीए (रेवा) द्वारा निर्मित बिजली से चलने वाले वाहनों के तीन काम चलाऊ मॉडल हमारे साथ थे। हर 120 किमी पर हमें बैटरी चार्ज करनी पड़ती थी, कुछ जगहों पर चार्जिंग पॉइंट में फेरबदल भी करना पड़ा था पर बिजली के अभाव वाले उन दिनों में भी हमें बहुत दिक्कत नहीं आई। मैं राजस्थान, उत्तराखंड और कर्नाटक में दूरवर्ती गांवों में गया। जहां ग्रिड थी वहां भी रोज 12-14 घंटे बिजली गायब रहती। न हेल्थ क्लिनिक चल पाते, न बच्चे पढ़ पाते।

2008 में ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका व भारत ने प्रगत स्वच्छ ऊर्जा भागीदारी (पेस) शुरू किया, जिसका मुख्य बिंदु ही मिलकर शोध व विकास करना था। दोनों देशों के वैज्ञानिक व उद्योग सौर ऊर्जा, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और जैव ईंधन पर काम करने के लिए साथ आए। प्रधानमंत्री मोदी गुजरात में अक्षय ऊर्जा की टेक्नोलॉजी लागू करने के प्रयोग कर चुके थे। जलवायु परिवर्तन पर एक किताब भी लिख चुके हैं। अब 2022 तक 20 गीगा वॉट सौर ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य पर्याप्त नहीं लगता था और उसी साल इस लक्ष्य को पांच गुना कर दिया गया। फिर तो 2030 तक सारे बिजली से चलने वाले राष्ट्रीय वाहन जैसे लक्ष्य तय हो गए।

हाल ही में मैंने भारत की 13 राजधानियों से होकर सफर किया और देखा कि आखिरकार पावर सरप्लस की स्थिति आ गई है। ऐसा नहीं कि हर व्यक्ति तक बिजली पहुंच गई है लेकिन, 2012 की गर्मी में ब्लैक आउट से 60 करोड़ लोगों को बिजली न मिलने की स्थिति से यह बहुत बेहतर है। भारतीय राज्य इनोवेशन के सेंटर बन गए हैं। कर्नाटक ने बिजली के वाहन और बैटरी स्टोरेज पर नीति बना ली है। वह नए बैटरी स्टोरेज इनोवेशन सेंटर, राज्यभर में चार्जिंग का ढांचा बनाने और ट्रेनिंग देकर इलेक्ट्रिक आॅटो टेक्निशियन की फौज तैयार करेगा। ओडिशा ने ऐसा कॉल सेंटर बनाया है, जो ग्राहकों की छत पर लगे सौर उर्जा उपकरणों की समस्याएं दूर करेगा। मिसौरी से महाराष्ट्र व कैलिफोर्निया से तमिलनाडु तक चुनौती एक ही है। व्यापक रूप से उपलब्ध अक्षय ऊर्जा को पहले ही अत्यधिक दबाव में आई ग्रिड से जोड़ना और नई पावर टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करना ताकि इस जटिल तंत्र का उचित प्रबंधन किया जा सके। हम तो बिजली के घोर संकट के दिनों में बिजली के वाहन चला पाए। कल्पना कीजिए कि आज क्या कुछ किया जा सकता है! @KartikeyaSingh

जब गुजरात के वडोदरा में मैं बड़ा हो रहा था तो मेरे माता-पिता मुझे और मेरी बहन को हर रविवार को चिड़ियाघर (जू़) ले जाते थे। मंै सेंचुरी एशिया और क्लब मैग्जि़न भी घंटों पढ़ा करता था। इस तरह वन्यजीवों और पर्यावरण के प्रति मेरी रुचि जागृत हुई। मैं किसी प्राणी संग्रहालय या राष्ट्रीय उद्यान में अधिकारी बनना चाहता था। मुझे यह कहना होगा कि मेरे पैरेंट्स ने बहुत जल्दी ही मेरे भीतर पर्यावरणवाद का बीज बो दिया था। अब जब मैं ऊर्जा के क्षेत्र मंें काम कर रहा हूं तो मैं इसे भूल नहीं सकता।

काम के संबंध में मेरी धारणा यह है कि मैं जोड़ने वाले अथवा किसी पहल को सक्रिय करने वाले की भूमिका निभा सकूं ताकि दुनिया के भले के लिए भागीदारी संभव हो सके। फिर मैं संवेदना से संचालित व्यक्ति हूं। यह एेसी चीज है, जिसे बचपन से बढ़े होते हुए जो अनुभव मिलते हैं उनमें से उसे ग्रहण किया जाता है। यह सब सुनते-पढ़ते हुए किसी फलसेफ की बात ही लगती है लेकिन, जुनून किस तरह साकार होता है उसका अनुभव सुनाता हूं। पर्यावरण की दिशा में मैंने 2008 में युवाअों के नेतृत्व वाला संगठन इंडियन युथ क्लाइमेट नेटवर्क बनाया था। इसके मार्फत हमने 2009 में ‘क्लाइमेट सॉल्यूशन रोड टूअर’ आयोजित किया था। ‘रेवा’ से किया जाने वाला सफर इसका हिस्सा था।

‘आपके पास बिजली से चलने वाले वाहन को चार्ज करने की व्यवस्था है?’ आंध्र प्रदेश के ग्रामीण अनंतपुर जिले के पेट्रोल पम्प मैनेजर देव रेड्‌डी ने मुझे ऐसे देखा जैसे वे समझ रहे हों। यह 2008 की बात है, जब देश के ज्यादातर लोगों ने बिजली से चलने वाली कार के बारे में सुना भी नहीं था। लेकिन बिना झिझके वे मुझे एक शेड के नीचे ले गए और बड़ा-सा प्लग पॉइंट दिखाया। इसका इस्तेमाल गन्ने का रस निकालने वाली मशीन के लिए होता था। मैं देखते ही समझ गया कि यह उस रेवा वाहन की बैटरी को चार्ज करने के लिए काफी है, जिसमें मैं और मेरे दोस्त भारतभर में 3,500 किलोमीटर का सफर करने वाले थे। तब यह सोचना कि जलवायु परिवर्तन के संकट के लिए भारत कोई नया टेक्नोलॉजी समाधान खोज लेगा, निरर्थक था। 40 करोड़ लोगों तक तो बिजली ही नहीं पहुंची थी। लेकिन, दस साल में यह सब बदल गया है। अब भारत अक्षय ऊर्जा में लीडर है।

रेड्‌डी के प्लग ने अच्छा काम किया। मैं और मेरे दोस्त जैव डीजल से चलने वाला ट्रक, बेकार वनस्पति तेल से चलने वाला कामचलाऊ घर जैसे वाहन और न्यूयॉर्क का सौर ऊर्जा से संचालित रॉकबैंड लेकर चेन्नई से नई दिल्ली तक जा पाए। इसे अमेरिकी विदेश मंत्रालय व भारत के अक्षय ऊर्जा मंत्रालय ने प्रायोजित किया था।

चालीस दिन की यात्रा में हम चेन्नई, वेल्लौर, बेंगलुरू, हैदराबाद, जयपुर, अहमदाबाद आदि पंद्रह शहरों में रुके और आखिर में दिल्ली पहुंचे। हम भारतीय और अमेरिकी युवाओं के मिश्रित समूह थे। आरईवीए (रेवा) द्वारा निर्मित बिजली से चलने वाले वाहनों के तीन काम चलाऊ मॉडल हमारे साथ थे। हर 120 किमी पर हमें बैटरी चार्ज करनी पड़ती थी, कुछ जगहों पर चार्जिंग पॉइंट में फेरबदल भी करना पड़ा था पर बिजली के अभाव वाले उन दिनों में भी हमें बहुत दिक्कत नहीं आई। मैं राजस्थान, उत्तराखंड और कर्नाटक में दूरवर्ती गांवों में गया। जहां ग्रिड थी वहां भी रोज 12-14 घंटे बिजली गायब रहती। न हेल्थ क्लिनिक चल पाते, न बच्चे पढ़ पाते।

2008 में ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका व भारत ने प्रगत स्वच्छ ऊर्जा भागीदारी (पेस) शुरू किया, जिसका मुख्य बिंदु ही मिलकर शोध व विकास करना था। दोनों देशों के वैज्ञानिक व उद्योग सौर ऊर्जा, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और जैव ईंधन पर काम करने के लिए साथ आए। प्रधानमंत्री मोदी गुजरात में अक्षय ऊर्जा की टेक्नोलॉजी लागू करने के प्रयोग कर चुके थे। जलवायु परिवर्तन पर एक किताब भी लिख चुके हैं। अब 2022 तक 20 गीगा वॉट सौर ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य पर्याप्त नहीं लगता था और उसी साल इस लक्ष्य को पांच गुना कर दिया गया। फिर तो 2030 तक सारे बिजली से चलने वाले राष्ट्रीय वाहन जैसे लक्ष्य तय हो गए।

हाल ही में मैंने भारत की 13 राजधानियों से होकर सफर किया और देखा कि आखिरकार पावर सरप्लस की स्थिति आ गई है। ऐसा नहीं कि हर व्यक्ति तक बिजली पहुंच गई है लेकिन, 2012 की गर्मी में ब्लैक आउट से 60 करोड़ लोगों को बिजली न मिलने की स्थिति से यह बहुत बेहतर है। भारतीय राज्य इनोवेशन के सेंटर बन गए हैं। कर्नाटक ने बिजली के वाहन और बैटरी स्टोरेज पर नीति बना ली है। वह नए बैटरी स्टोरेज इनोवेशन सेंटर, राज्यभर में चार्जिंग का ढांचा बनाने और ट्रेनिंग देकर इलेक्ट्रिक आॅटो टेक्निशियन की फौज तैयार करेगा। ओडिशा ने ऐसा कॉल सेंटर बनाया है, जो ग्राहकों की छत पर लगे सौर उर्जा उपकरणों की समस्याएं दूर करेगा। मिसौरी से महाराष्ट्र व कैलिफोर्निया से तमिलनाडु तक चुनौती एक ही है। व्यापक रूप से उपलब्ध अक्षय ऊर्जा को पहले ही अत्यधिक दबाव में आई ग्रिड से जोड़ना और नई पावर टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करना ताकि इस जटिल तंत्र का उचित प्रबंधन किया जा सके। हम तो बिजली के घोर संकट के दिनों में बिजली के वाहन चला पाए। कल्पना कीजिए कि आज क्या कुछ किया जा सकता है! @KartikeyaSingh

जब गुजरात के वडोदरा में मैं बड़ा हो रहा था तो मेरे माता-पिता मुझे और मेरी बहन को हर रविवार को चिड़ियाघर (जू़) ले जाते थे। मंै सेंचुरी एशिया और क्लब मैग्जि़न भी घंटों पढ़ा करता था। इस तरह वन्यजीवों और पर्यावरण के प्रति मेरी रुचि जागृत हुई। मैं किसी प्राणी संग्रहालय या राष्ट्रीय उद्यान में अधिकारी बनना चाहता था। मुझे यह कहना होगा कि मेरे पैरेंट्स ने बहुत जल्दी ही मेरे भीतर पर्यावरणवाद का बीज बो दिया था। अब जब मैं ऊर्जा के क्षेत्र मंें काम कर रहा हूं तो मैं इसे भूल नहीं सकता।

काम के संबंध में मेरी धारणा यह है कि मैं जोड़ने वाले अथवा किसी पहल को सक्रिय करने वाले की भूमिका निभा सकूं ताकि दुनिया के भले के लिए भागीदारी संभव हो सके। फिर मैं संवेदना से संचालित व्यक्ति हूं। यह एेसी चीज है, जिसे बचपन से बढ़े होते हुए जो अनुभव मिलते हैं उनमें से उसे ग्रहण किया जाता है। यह सब सुनते-पढ़ते हुए किसी फलसेफ की बात ही लगती है लेकिन, जुनून किस तरह साकार होता है उसका अनुभव सुनाता हूं। पर्यावरण की दिशा में मैंने 2008 में युवाअों के नेतृत्व वाला संगठन इंडियन युथ क्लाइमेट नेटवर्क बनाया था। इसके मार्फत हमने 2009 में ‘क्लाइमेट सॉल्यूशन रोड टूअर’ आयोजित किया था। ‘रेवा’ से किया जाने वाला सफर इसका हिस्सा था।

‘आपके पास बिजली से चलने वाले वाहन को चार्ज करने की व्यवस्था है?’ आंध्र प्रदेश के ग्रामीण अनंतपुर जिले के पेट्रोल पम्प मैनेजर देव रेड्‌डी ने मुझे ऐसे देखा जैसे वे समझ रहे हों। यह 2008 की बात है, जब देश के ज्यादातर लोगों ने बिजली से चलने वाली कार के बारे में सुना भी नहीं था। लेकिन बिना झिझके वे मुझे एक शेड के नीचे ले गए और बड़ा-सा प्लग पॉइंट दिखाया। इसका इस्तेमाल गन्ने का रस निकालने वाली मशीन के लिए होता था। मैं देखते ही समझ गया कि यह उस रेवा वाहन की बैटरी को चार्ज करने के लिए काफी है, जिसमें मैं और मेरे दोस्त भारतभर में 3,500 किलोमीटर का सफर करने वाले थे। तब यह सोचना कि जलवायु परिवर्तन के संकट के लिए भारत कोई नया टेक्नोलॉजी समाधान खोज लेगा, निरर्थक था। 40 करोड़ लोगों तक तो बिजली ही नहीं पहुंची थी। लेकिन, दस साल में यह सब बदल गया है। अब भारत अक्षय ऊर्जा में लीडर है।

रेड्‌डी के प्लग ने अच्छा काम किया। मैं और मेरे दोस्त जैव डीजल से चलने वाला ट्रक, बेकार वनस्पति तेल से चलने वाला कामचलाऊ घर जैसे वाहन और न्यूयॉर्क का सौर ऊर्जा से संचालित रॉकबैंड लेकर चेन्नई से नई दिल्ली तक जा पाए। इसे अमेरिकी विदेश मंत्रालय व भारत के अक्षय ऊर्जा मंत्रालय ने प्रायोजित किया था।

चालीस दिन की यात्रा में हम चेन्नई, वेल्लौर, बेंगलुरू, हैदराबाद, जयपुर, अहमदाबाद आदि पंद्रह शहरों में रुके और आखिर में दिल्ली पहुंचे। हम भारतीय और अमेरिकी युवाओं के मिश्रित समूह थे। आरईवीए (रेवा) द्वारा निर्मित बिजली से चलने वाले वाहनों के तीन काम चलाऊ मॉडल हमारे साथ थे। हर 120 किमी पर हमें बैटरी चार्ज करनी पड़ती थी, कुछ जगहों पर चार्जिंग पॉइंट में फेरबदल भी करना पड़ा था पर बिजली के अभाव वाले उन दिनों में भी हमें बहुत दिक्कत नहीं आई। मैं राजस्थान, उत्तराखंड और कर्नाटक में दूरवर्ती गांवों में गया। जहां ग्रिड थी वहां भी रोज 12-14 घंटे बिजली गायब रहती। न हेल्थ क्लिनिक चल पाते, न बच्चे पढ़ पाते।

2008 में ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका व भारत ने प्रगत स्वच्छ ऊर्जा भागीदारी (पेस) शुरू किया, जिसका मुख्य बिंदु ही मिलकर शोध व विकास करना था। दोनों देशों के वैज्ञानिक व उद्योग सौर ऊर्जा, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और जैव ईंधन पर काम करने के लिए साथ आए। प्रधानमंत्री मोदी गुजरात में अक्षय ऊर्जा की टेक्नोलॉजी लागू करने के प्रयोग कर चुके थे। जलवायु परिवर्तन पर एक किताब भी लिख चुके हैं। अब 2022 तक 20 गीगा वॉट सौर ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य पर्याप्त नहीं लगता था और उसी साल इस लक्ष्य को पांच गुना कर दिया गया। फिर तो 2030 तक सारे बिजली से चलने वाले राष्ट्रीय वाहन जैसे लक्ष्य तय हो गए।

हाल ही में मैंने भारत की 13 राजधानियों से होकर सफर किया और देखा कि आखिरकार पावर सरप्लस की स्थिति आ गई है। ऐसा नहीं कि हर व्यक्ति तक बिजली पहुंच गई है लेकिन, 2012 की गर्मी में ब्लैक आउट से 60 करोड़ लोगों को बिजली न मिलने की स्थिति से यह बहुत बेहतर है। भारतीय राज्य इनोवेशन के सेंटर बन गए हैं। कर्नाटक ने बिजली के वाहन और बैटरी स्टोरेज पर नीति बना ली है। वह नए बैटरी स्टोरेज इनोवेशन सेंटर, राज्यभर में चार्जिंग का ढांचा बनाने और ट्रेनिंग देकर इलेक्ट्रिक आॅटो टेक्निशियन की फौज तैयार करेगा। ओडिशा ने ऐसा कॉल सेंटर बनाया है, जो ग्राहकों की छत पर लगे सौर उर्जा उपकरणों की समस्याएं दूर करेगा। मिसौरी से महाराष्ट्र व कैलिफोर्निया से तमिलनाडु तक चुनौती एक ही है। व्यापक रूप से उपलब्ध अक्षय ऊर्जा को पहले ही अत्यधिक दबाव में आई ग्रिड से जोड़ना और नई पावर टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करना ताकि इस जटिल तंत्र का उचित प्रबंधन किया जा सके। हम तो बिजली के घोर संकट के दिनों में बिजली के वाहन चला पाए। कल्पना कीजिए कि आज क्या कुछ किया जा सकता है! @KartikeyaSingh

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