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जैनागम में प्रारंभ से ही वनस्पति थी जीव, विज्ञान ने 1911 में माना

3 वर्ष पहले
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गुना | जैनागम में कही गई एक- एक बात पूर्णरूपेण सत्य है। विज्ञान 1911 के पूर्व तक वनस्पति में जीव नहीं मानता था। 1911 के उपरांत विज्ञान ने स्वयं कहा कि वृक्ष, पेड़, पौधे भी एक जीव होते हैं। जैनागम में प्रारंभ से ही वृक्ष, जल, अग्रि, भूमि आदि सभी को एक जीव माना है। यह बात मुनि निर्णय सागरजी महाराज ने कही। वह शहर के चौधरी मोहल्ला स्थित महावीर परिसर में रविवार सुबह विशेष धर्मसभा को संबोधित करते हुए बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि जिन धर्म बताता है कि हमारे चारों ओर परमाणु उपस्थित है। हमारे शुभ- अशुभ परिणामों के अनुसार शुभ और अशुभ कर्मों का बंध होता रहता है। जिस तरह अदृश्य रूप से मोबाइल व टीवी के ध्वनि एवं दृश्य तरंगें अदृश्य रूप में हमारे चारों ओर रहती है। उसी तरह कर्णम परमाणु भी हमारे चारों और विद्यमान है। शुभ विचार, वाणी और व्यवहार करने से शुभ कर्मों का बंध होता है। जो वर्तमान और भविष्य को शुभ बनाता है। मुनिश्री ने कहा कि कल्याण का जब निमित्त होता है तो साधारण मुनिराज से भी कल्याण हो सकता है और जब निमित्त नहीं होता तो तीर्थंकर के उपदेश भी कल्याणकारी नहीं हो पाते। मारीच के जीव का कल्याण प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान के वचन भी न कर सके और कालांतर में शेर की पर्याय में साधारण मुनि के वचनों को सुन कल्याण हो गया। जैन समाज के आनंद जैन ने बताया कि दोपहर में अष्टपाहुड़ ग्रंथ की वाचना रोज मुनिद्वय के सानिध्य में चल रही है। इस मौके पर अध्यक्ष संजीव जैन, मंत्री कमलेश जैन, बजरंगगढ़ अध्यक्ष एसके जैन, संजय कठरिया, पीके जैन, संजय कामिनी, बंटी भैया, जीतू भैया, संजय सोना आदि उपस्थित थे।

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