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कानून की भाषा से ज्यादा उसके मर्म पर जोर देते थे डीजे संजीव दत्ता

3 वर्ष पहले
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जिला न्यायाधीश संजीव दत्ता का अंतिम संस्कार रविवार 3 बजे यहां मुक्तिधाम में हुआ। गेंदे के फूलों से सजे एक वाहन पर उनका शव रखा गया था। उनकी अंतिम यात्रा में सैकड़ों लोग शामिल थे। यह सिर्फ इसलिए नहीं था कि वे एक बड़े पद पर आसीन थे, इससे भी बड़ी वजह उनका व्यक्तित्व था, जिसने न केवल न्यायपालिका बल्कि समाज के कई अंगों से जुड़े लोगों को प्रभावित किया। उनको अच्छी तरह जानने वालों का कहना था कि वे कानून को उसकी भाषा से नहीं बल्कि मर्म से समझाते थे।

श्री दत्ता का निधन शनिवार देर शाम को हो गया था। उनका पूरा दिन व्यस्तता से भरा हुआ था। यहां एक कार्यक्रम के सिलसिले में जबलपुर हाईकोर्ट से जस्टिस पालो आए हुए थे। उनके साथ वे लगभग पूरे दिन व्यस्त रहे। शाम को वे व जस्टिस पालो वरिष्ठ वकील प्रेमकुमार सूद का हाल चाल जानने आए थे। वहां से लौटते हुए उन्हें कार में एक उल्टी हुई। इसके बाद वे बंगले चले गए और वहां कुछ दवाएं ली। उन्होंने जस्टिस पालो को फोन करके बताया कि उनकी तबियत ठीक नहीं है और वे अस्पताल जा रहे हैं। रास्ते में उन्हें दो और उल्टियां हुईं और अस्पताल पहुंचते-पहुंचते वे अचेत हो चुके थे। जांच के बाद डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

स्मृति शेष

जिला न्यायाधीश संजीव दत्ता के अंतिम संस्कार में सैकड़ों लोग हुए शामिल, शनिवार को हृदय गति रुक जाने से निधन

3 बातें जो उन्हें औरों से अलग बनाती थीं

जुड़ाव : आम लोगों से उनका सीधा जुड़ाव था। एक वकील ने बताया कि कुछ माह पहले एक गरीब शख्स सीधे उनके चैंबर में चला गया। जब उसने बताया कि वह गरीबी की वजह से वकील की फीस अदा नहीं कर पा रहा है तो डीजे साहब ने तुरंत विधिक सहायता विभाग के क्लर्क को बुलाया। क्लर्क ने उक्त व्यक्ति से गरीबी रेखा का कार्ड मांगा। इस पर डीजे साहब ने कहा कि वह गरीब है। फिर इसमें तर्क-वितर्क की बात कहां से आ गई।

समाधान पर जोर : वे प्रक्रियाओं से ज्यादा समाधान पर जोर देते थे। वकील पुष्पराग ने बताया कि उपभोक्ता फोरम के परिसर में सूख रहे पेड़ पौधों के लिए पानी का इंतजाम उन्होंने ऐसे ही कराया। उस समय फोरम में कोई नहीं था तो उन्होंने कलेक्टर को पत्र लिखवाया कि न्यायालय परिसर में एक ट्यूबवेल की जरूरत है। और यह काम दो दिन के भीतर हो भी गया।

सादगी : सादगी उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ताकत थी। घर के लिए सब्जी वे खुद ही खरीदते थे। नयापुरा की सब्जी मंडी में उन्हें सब्जीवालों के साथ भाव-ताव करते हुए अक्सर देखा जा सकता था। 9वीं में पढ़ने वाली अपनी बेटी के लिए वे खुद ही किताबें खरीदने गए। वे ज्यादातर घर के काम खुद निपटाते थे।

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