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सिंध के एनीकट ढांचे में सुधार के बाद...

3 वर्ष पहले
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1 कटाव से बचाव : विंग वॉल नदी की बाढ़ से किनारों का कटाव रोकने के लिए लगभग 100 मीटर लंबी और 10 मीटर ऊंची दीवार बनाई गई है। इसे विंग वॉल कहा जाता है। पुराने ढांचे में यह 20 मीटर से भी कम लंबाई वाली थी। कटाव की वजह इसे ही बताया जा रहा है।

पिछले साल तीन मीटर पानी रोकने का किया था दावा पर योजना हो गई थी फेल

मनीष दुबे | गुना

72 करोड़ की जल आवर्धन योजना के मुख्य घटक यानि सिंध नदी के एनीकट के विस्तार का काम लगभग पूरा हो गया है। इसे पूरी तरह बनने में 7 साल का समय लग गया। इसका मूल ढांचा पांच साल पहले बन गया था, लेकिन पहली ही बारिश में नदी ने इसकी अशोकनगर वाली साइड पर 20 मीटर से ज्यादा लंबा कटाव कर दिया। इसके चलते इसमें जलभराव नहीं हो सका। अब सिंचाई विभाग के इंजीनियरों द्वारा सुझाए गए डिजाइन के आधार पर दोबारा इसका विस्तार व सुधार किया गया है। नगर पालिका के जल प्रकोष्ठ के इंजीनियर जीके अग्रवाल का दावा है कि इस बार 4 मीटर पानी रोका जाएगा। वहीं नगर पालिका अध्यक्ष ने कहा कि अगर अच्छी बारिश हुई और योजना के मुताबिक पानी रुका तो हम शहर में दाेनों समय पानी सप्लाई करेंगे। अब तक इस योजना पर 8 करोड़ खर्च हो चुके हैं और शहर को कोई फायदा नहीं हुआ है।

7 साल में 8 करोड़ खर्च, पिछले साल कटाव से नहीं रुका पानी अब 4 मीटर पानी रोकने का दावा, दोनों टाइम सप्लाई का वादा

पिछले साल इसके 12 पिलर और विंग वॉल का काम पूरा नहीं हो पाया था, अब गेट लगना बाकी, जिससे इसकी क्षमता के मुताबिक 9 मीटर तक पानी रोका जा सके

एनीकट में अब किस तरह के बदलाव किए गए

पिछले साल सिर्फ गाद बची थी

पिछले साल नपा ने दावा किया था कि हम 3 मीटर पानी रोकेंगे और दो टाइम सप्लाई की जाएगी। 3 मीटर पानी रोका भी गया, लेकिन शहर को एक बूंद पानी भी नसीब नही हुआ। इस साल भी शहर को ट्यूबवेल की सप्लाई पर निर्भर रहना पड़ा।

1974 में पहली बार शहर में सिंध नदी का पानी लाने के लिए योजना बनी थी। तब शहर की आबादी 50 हजार के आसपास थी। आज शहर की आबादी 2 लाख से ज्यादा हो गई है, लेकिन पेयजल सप्लाई का ढांचा वही का वही है।

2017 में कम बारिश के कारण एनीकट का उपयोग नहीं हो पाया था, प्रदूषित पानी होने की वजह से भोपाल के अधिकारियों ने सिटी सप्लाई पर लगा दी थी रोक

सिंध एनीकट का निर्माण कार्य पूरा हो गया हैं। संभवत: इस साल इसमेंं पानी रुक पाए।

72 करोड़ की वर्तमान जल आवर्धन योजना 2.50 लाख की आबादी को मद्देनजर रखकर तैयार की गई है। हालांकि यह 15 साल पहले ही पूरी हो जाना चाहिए थी और अब तक तीसरी परियोजना को लेकर विचार आरंभ हो जाना चाहिए था।

2 की वॉल : विंग वॉल से जोड़कर नदी के किनारे करीब 10 से 12 मीटर लंबी की वॉल भी बनाई गई है। यह पहले भी थी, लेकिन बहुत छोटी। इससे विंग वॉल को मजबूती मिलती है और पूरा ढांचा पानी के दबाव को सह सकता है।

08 करोड़ लागत वाले एनीकट पर ही 72 करोड़ की योजना का भविष्य निर्भर है। योजना के मुताबिक 5 माह यानि 150 दिन सिंध नदी के जल प्रवाह से सीधे जल प्रदाय होगा। बाकी 250 दिन एनीकट में संग्रहित होने वाले 7.50 मिलियन घनमीटर पानी से सप्लाई होगी।

क्या वजह रही पानी न मिलने की

नपा के इंजीनियर श्री अग्रवाल एक ओर तो कहते हैं कि हमने पिछले साल 3 मीटर पानी रोका था। वहीं शहर को सप्लाई न किए जाने के सवाल पर उनका कहना था कम बारिश के कारण नदी में पर्याप्त पानी नहीं आ पाया था। दरअसल बारिश के दौरान आने वाला पानी नहीं रोका जाता है, क्योंकि इसमें गाद होती है। पानी रोकने का काम बारिश के अंतिम चरण में होता है पर कम बारिश के कारण बाद में नदी में पानी बहुत कम आया। जो पानी बचा वह इतना गंदा था कि उसे सप्लाई करना संभव नहीं था।

3 ढांचे की लंबाई : नई विंग वॉल की वजह से एनीकट का मूल ढांचा भी करीब 20 मीटर और लंबा हो गया है। इसकी कुल लंबाई अब 180 मीटर के आसपास होगी। इसमें 17 और पिलर खड़े किए जाएंगे, जिनमें गेट लगेंगे। मूल ढांचा 64 गेट वाला था, जो अब 81 का हो जाएगा।

एक्सपर्ट कमेंट

इस ढांचे का मुकाबला किससे है

एनीकट के बिंदु पर नदी का जलग्रहण क्षेत्र लगभग 1674 वर्ग किमी है। बाढ़ की स्थिति में एनीकट से 4972 घनमीटर पानी हर सेकंड में गुजरेगा।

यह ढांचा नदी के मोड़ के ठीक पास ही है। इससे नदी का बहाव अवरुद्ध होता है। परिणामस्वरूप पानी ऊपर उठकर निकलने के लिए अन्य मार्ग तलाशता है। 2012 में यही हुआ और पानी ने किनारों को काट दिया।

ढांचे को लगभग 7.50 मिलियन घन मीटर पानी का दबाव हमेशा सहना पड़ेगा। यह इसकी जलभराव क्षमता है।

एनीकट के बिंदु पर नदी का जलग्रहण क्षेत्र लगभग 1674 वर्ग किमी है। बाढ़ की स्थिति में एनीकट से 4972 घनमीटर पानी हर सेकंड में गुजरेगा।

ढांचे को लगभग 7.50 मिलियन घन मीटर पानी का दबाव हमेशा सहना पड़ेगा। यह इसकी जलभराव क्षमता है।

जैसा की सिंचाई विभाग के पूर्व इंजीनियर एसके राजोरिया ने बताया।

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