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‘ताजमहल का टेंडर’ ने की सरकारी व्यवस्था पर चोट

3 वर्ष पहले
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मुगल बादशाह शाहजहां को अपनी फरमाइश पूरी कराने के लिए सरकारी दफ्तरों के सैकड़ों चक्कर लगाने पड़ते हैं। फिर भी नौकरशाही के सामने बेबस इस बादशाह का सपना पूरा नहीं हो पाता और वे थक-हारकर अंतिम क्षणों में पहुंच जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि हमारी सरकारी व्यवस्था इतनी कमजोर है कि सही समय पर कोई काम पूरा नहीं हो सकता। यह संदेश सिंधिया स्कूल फोर्ट के स्टूडेंट्स ने नाटक ‘ताजमहल का टेंडर’ के माध्यम से दर्शकों को दिया। स्कूल के प्रांगण में बुधवार को इस नाटक का मंचन किया गया। इसके माध्यम से कलाकारों ने मुगल बादशाह शाहजहां को वर्तमान समय में अवतरित करते हुए बताया। साथ ही आज की व्यवस्था और अफसरशाही से मिन्नतें कर ताजमहल बनवाने के लिए मजबूर होते हुए दर्शाया। सरकारी व्यवस्था पर चोट करते नाटक ने दर्शकों को हंसाया।

सिंधिया स्कूल के श्री शुक्ल स्मृति मुक्ताकाशी मंच पर बुधवार को ताजमहल का टेंडर नाटक का मंचन हुआ

Drama In ‌School

कहानी | यह नाटक बादशाह शाहजहां के ख्वाब पर आधारित है, जिसमें पीडब्ल्यूडी के चीफ इंजीनियर के मध्य मुमताज की याद में एक इमारत बनवाने पर चर्चा होती है। इस ख्वाब में काफी सोच-विचार के बाद वो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि मुमताज की याद में एक मकबरा बनवाएंगे, जिसका नाम होगा ताजमहल। एक बेहद चालाक और भ्रष्ट अधिकारी गुप्ता जी शाहजहां को अपने जाल में फंसा लेता है। इससे हास्य मिश्रित व्यंग्य भरी स्थितियों का निर्माण होता है। शाहजहां को ताजमहल की अरजी के अनुमोदन में ही अफसरशाही 25 साल लगा देती है। उसके बाद ताजमहल के निर्माण का टेंडर निकाला जाता है, जो सरकारी महकमों में विकास कार्यों के अटके पड़े प्रोजेक्ट की कहानी दर्शाता है। नाटक में सरकारी व्यवस्था पर कटाक्ष किया गया है।

एक नजर में नाटक

लेखक: अजय शुक्ल डायरेक्टर: मनोज मिश्रा पात्र: 35 गुप्ता जी- कुशाग्र गुप्ता शाहजहां- दर्शन सिंघल सुधीर- सुनील कुमार भैया जी- अभिनव सिद्धार्थ नेता-1- ऋषभ जैन

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