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सुहागिनों ने वट पूजा कर मांगा सौभाग्य और दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश

3 वर्ष पहले
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सौभाग्य अौर खुशहाली के लिए मंगलवार को वट अमावस्या पर महिलाअों ने समूह में वट वृक्ष की पूजा की। उन्होंने वट वृक्ष के चारों ओर धागा बांधा फिर अक्षत,चंदन आैर नैवैद्य के साथ घर पर तैोयार किए गए पकवान चढ़ाकर अपने सौभाग्य, सुख आैर समृद्धि की प्रार्थना की। इसके बाद उन्होंने वट वृक्ष की परिक्रमा लगाई और फिर घर पहुंचकर अपना व्रत खोला। कुछ क्षेत्रों में वट वृक्ष घर से काफी दूर होने के कारण महिलाआें ने अपने परिजनों से वट वृक्ष की टहनियां मंगाकर घर में ही पूजा की।

सामूहिक रूप से बरगद के वृक्ष की पूजा करतीं महिलाएं। फोटो: भास्कर

भगवान शंकर, बुद्ध व ऋषभ देव ने भी बरगद के वृक्ष के नीचे की थी तपस्या

वट पूजा के पीछे सत्यवान-सावित्री की पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। किंवदंती है कि यमराज जब सत्यवान के प्राण हर कर ले जाने लगे तो सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे ही उन्हेंं सत्यवान के प्राण लौटाकर पुन: जीवित करने पर विवश कर दिया था। तभी से महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य की कामना के लिए इस व्रत आैर पूजन करती हैं। एक अन्य कथा के अनुसार वट वृक्ष की जड़ में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु आैर अग्र भाग में शिव का वास होता है। इसलिए भी इसकी पूजा का महत्व है। भगवान शिव ने भी वट वृक्ष के नीचे समाधि लगाई थी। भगवान बुद्ध को भी वट वृक्ष के नीचे ही ज्ञान प्राप्त हुआ था। जैैन तीर्थंकर ऋषभदेव ने भी इसके नीचे तपस्या की थी। इसीलिए बौद्ध आैर जैन धर्म में भी वट वृक्ष को महत्व दिया जाता है।

जड़ से लेकर छाल, पत्ती और दूध तक आता है दवा के काम

धार्मिक आस्था आैर मान्यताआें के अलावा वट वृक्ष पर्यावरण आैर आैषधीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इसकी जड़, छाल, पत्ती से लेकर दूध का तरह-तरह की आैषधियों में इस्तेमाल होता है। एक शोध के मुताबिक वट वृक्ष का एक पत्ता एक घंटे में 5 मिलीलीटर ऑक्सीजन का उत्सर्जन करता है। सबसे घना होने के कारण यह ज्यादा छायादार होता है।

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