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इस एडवेंचर गेम्स पर रोक से 3 लाख होंगे...

3 वर्ष पहले
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इस एडवेंचर गेम्स पर रोक से 3 लाख होंगे...

सुरक्षा के लिए पॉलिसी बनाएं। याचिकाकर्ता हरिओम कश्यप ने भास्कर को बताया कि 2014 में याचिका गंगा किनारे लगने वाले कैम्प को लेकर लगाई थी। रिवर राफ्टिंग के नाम पर पर्यटकों को गंगा के किनारे मांस-शराब परोसी जाती है। रिवर राफ्टिंग कंपनियां नाव में पीने के पानी की बोतलें मुहैया करवाती हैं इस्तेमाल के बाद उन्हें नदी में ही फेंक दिया जाता है। इससे गंगा प्रदूषित हो रही है। करोड़ों लोगों की आस्था को भी चोट पहुंच रही है। कोर्ट ने कहा है कि पर्यटन के नाम अय्याशी बर्दाश्त नहीं है। ऋषिकेश जल पुलिस की एक टुकड़ी ने भास्कर को बताया कि यहां युवा पर्यटक दिन हो या शाम हो, कहीं भी गंगा किनारे उतरकर शराब वगैरह पीते हैं। उसी जोश में गंगा नहाने उतरते हैं। इसमें जान जाने का खतरा रहता है। एक जवान ने बताया कि हर हफ्ते तकरीबन 3 से 4 लोगों की मौत होती है। एक डेड बॉडी रिकवर करने में 5 से 6 दिन का समय लग जाता है। रिवर राफ्टिंग से जुड़े कल्याण सिंह कहते हैं कि सरकार पर्यटकों को सुविधा नहीं दे रही है। रिवर राफ्टिंग के लिए ड्रेस चेंज करनी होती है। लेकिन सरकार की तरफ से कोई सुविधा नहीं है। न ही स्टार्टिंग पॉइंट पर और न ही फिनिशिंग पॉइंट पर कोई भी चेंजिंग रूम है। पार्किंग की सुविधा न होने की वजह से शिवपुरी में सीजन में भीषण जाम लगता है। क्योंकि इन्ही दिनों में बदरीनाथ और केदारनाथ के कपाट भी खुलते हैं और रास्ता यहीं से जाता है। कोर्ट के निर्देश ने शिवपुरी को सूना कर दिया है। शिवपुरी में 400 से 450 कंपनियां रिवर राफ्टिंग का काम कर रही हैं। रिवर राफ्टिंग के काम में लगे गोविन्द सिंह नेगी कहते हैं कि पिछले 15 सालों से यही काम करते आ रहे हैं। हर महीने 40-45 हजार रुपए आ जाते हैं। उसी से घर का खर्च चलता है। जबकि दो महीने बरसात के समय रिवर राफ्टिंग जब बंद रहता है। तब बचत के पैसों से काम चलता है। अब इस प्रतिबंध से तो हमारा रोजगार छिन जाएगा। शिवपुरी के साईं गंगा कॉटेज के मालिक दलजीत सिंह कहते हैं कि फिलहाल राहत इस बात की है कि एडवेंचर गेम्स बरसात में 2 महीने बंद रहता है, लेकिन यही बैन एक महीने पहले लगता तो कई व्यवसाइयों की कमर टूट जाती।

नशा और मौज-मस्ती - शिवपुरी जाते वक्त हमें रास्ते अंग्रेजी शराब का ठेका दिखा। अमूमन एक दुकान में ही शराब बिकती दिखती है, लेकिन यहां नजारा कुछ अलग था। शराब ट्रक से मिल रही थी। शिवपुरी पहुंचकर गंगा किनारे कुछ दूर चले तो वहां भी यही नजारा दिखा। जगह-जगह बीयर और शराब की बोतलें पड़ी दिखीं।

आधार लिंक न होने से बुक नहीं हो पा रहे हैं...

यानी अभी 2.91 करोड़ के करीब यूजर ने आधार लिंक नहीं कराया है। भास्कर से बातचीत में एक अधिकारी ने बताया कि कुल टिकट बुकिंग में करीब 5 फीसदी टिकट ऐसे बुक होते हैं जिनमें लोग 6 या इससे अधिक यात्री का टिकट करवाते हैं। 16 साल पहले आईआरसीटीसी से ऑनलाइन रिजर्वेशन शुरू होने पर लोगों ने अपना अकाउंट बनाया और घर बैठे बुकिंग शुरू कर दी। अकाउंट बनाते समय तमाम लोगों ने पूरा नाम न लिखकर आधा नाम लिखा। उन्हेंं इस बात का आभास नहीं था कि भविष्य में 6 लोगों से अधिक रिजर्वेशन के लिए आधार लिंक जरूरी हो जाएगा।

यहां हर घंटे जवानों को जगाते हैं ताकि सांस...

रोजाना 300-400 जवानों की मेडिकल की जाती है। वहीं 15 से 20 बीमार होकर आते हैं। हर दो से तीन दिन में एक बार जवान ऊपर से गंभीर बीमार होकर आते हैं। सियाचिन के रण क्षेत्र में चौकियों पर तैनाती से पहले भारतीय सेना के जवानों को तीन हफ्ते की कठोर ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है। 12 हजार फीट की ऊंचाई स्थित सियाचिन बैटल स्कूल (एसबीएस) में ट्रेनिंग में खरा उतरने के बाद ही जवान को भेजा जाता है। इसके लिए एक सप्ताह तक एक्लेमेटाइजेशन यानी 18 हजार से ज्यादा ऊंचाई पर प्रतिकूल मौसम में रहना सिखाया जाता है। ताकि कम ऑक्सीजन, हवा के कम दबाव, माइनस तापमान, ब्लड प्रेशर कम होने, नींद नहीं आने, याददाश्त खोने, मेटल बाइट यानी माइनस में ठंडी लोहे की वस्तु के हाथ लगाते अंगुलियों के काम नहीं करने जैसे खतरों से बचना सिखाया जाता है। ट्रेनिंग ले चुके आशीष वर्मा व लाल मोहम्मद बताते हैं कि माइनस चालीस डिग्री तापमान में हथियार की देखभाल करने, उसे चलाने, बर्फ की खड़ी दीवार पर चढ़ने, रोप अप होकर चलने, टेंट में बर्फ की परत पर स्लीपिंग बैड में सोने, हिमस्खलन से बचने के तरीके सिखाए जाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण स्वास्थ्य परीक्षण में खरा उतरने पर फॉरवर्ड पोस्ट भेजा जाता हैं। ऊंचाई में तैनाती के बाद हाल में बेस कैंप लौटे डोगरा रेजिमेंट के सुबेदार पुरुषोत्तम कुमार बताते हैं कि यहां ट्रेनिंग पूरी होने के बाद हमारी यूनिट के सीओ हमें फारवर्ड पोस्ट के लिए रवाना करते हैं। यहां से जाने से पहले सभी जवान ओपी बाबा के दर्शन करते हैं। यहां पैदल रवाना होकर पोस्ट तक पहुंचने में दस दिन का वक्त लग जाता है। वहां पर पोस्ट पर जाते ही दिनचर्या पूरी बदल जाती है। सुबह साढ़े चार बजे सूर्योदय होते ही सबसे पहले टेंट में रहने वाले छह सात जवानों के लिए पानी का इंतजाम करना होता है। इसके लिए 30 से 35 किलो बर्फ लाकर उसे गर्म करते हंै, तब 17 से 18 लीटर पानी बनता है। इस पानी को टेबलेट डालकर कीटाणु रहित बनाते हंै। दिनभर यही पानी पीने के काम आता है। इसके साथ ही टेंट व हथियारों का मेंटेनेंस करते हैं। फिर पेट्रोलिंग के लिए निकल पड़ते हैं। जवान रोप अप यानी एक रस्सी से एक दूसरे को बांधकर चलते हैं, ताकि कोई बर्फ के नीचे गिरे तो तुरंत ही बाहर निकाला जा सके। ग्लेशियर व बेस कैंप के बीच यहां हेलिकॉप्टर लाइफ लाइन बने हुए हंै। जवानों के लिए 21 हजार फीट की ऊंचाई तक बनी पोस्ट पर रसद पहुंचाने, रेस्क्यू करने में और सर्च ऑपरेशन में अहम भूमिका निभा रहे हैं। यहां आर्मी एविएशन कोर के हेलिकॉप्टर तैनात हैं। यहां तैनात पायलट ड्रॉपिंग प्वाइंट पर रसद उतारते हैं इमरजेंसी का ऐलान होते ही तुरंत ही विपरीत हालात में भी उड़ जाते हैं। सियाचिन के बेस कैंप में दुनिया का सबसे ऊंचा एटीसी टावर यानी एयर ट्रैफिक कंट्रोल बना हुआ है, जो हर समय व्यस्त रहता है। जवान को ऊपर से लाने में चार से पांच मिनट का समय लगता है तो बेस कैंप से लेह तक जाने में चालीस मिनट। सियाचिन में जवानों के लिए डिब्बा बंद खाना और तरल पदार्थ ही मुख्य खाना है।

फुटबॉल विश्वकप में चीन की टीम नहीं...

चीन ने फुटबॉल विश्वकप बस एक ही बार 2002 में खेला है।

ऐसा क्यों हुआ?: दरअसल चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग फुटबॉल के बड़े फैन हैं। चीन के लिए उनके तीन सपने हैं। एक- वह विश्वकप में भाग ले। दूसरा- वह इसकी मेजबानी करे और तीसरा- चीन जीते। चीन में फुटबॉल स्कूलों में जमकर निवेश किया जा रहा है। साथ ही यूरोपीय टीमों से प्रशिक्षण लेकर उनके स्तर का खेल सीखा जा रहा है। एक अरब 37 करोड़ से ज्यादा की आबादी में प्रतिभाएं ढूंढ़ी जा रही हैं।

जैकेट के शेष
ग्वालियर, रविवार 08 जुलाई, 2018 |

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