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फाइल से लेकर चिट्‌ठी तक कम्प्यूटर पर पेपरलेस हुआ लैंड रिकॉर्ड का मुख्यालय

3 वर्ष पहले
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मोतीमहल में स्थित मप्र लैंड रिकॉर्ड मुख्यालय 1 मई 2018 से पेपरलेस हो गया है। फाइल से लेकर चिट्ठी तक यहां हर काम अब कंप्यूटर पर ई-ऑफिस सॉफ्टवेयर के जरिए हो रहा है। ग्वालियर स्थित लैंड रिकॉर्ड कमिश्नरेट प्रदेश में ऐसा करने वाला पहला दफ्तर बन गया है। पूरे ऑफिस को पेपरलेस बनाने से पहले लैंड रिकॉर्ड कमिश्नरेट के 150 अधिकारी-कर्मचारियों को एनआईसी के माध्यम से ऑनलाइन वर्किंग की ट्रेनिंग दी गई। इसके साथ ही ऑफिस के रिकॉर्ड की 10 हजार फाइलों के करीब 4 लाख पेजों को स्कैन कर उन्हें ई-ऑफिस सॉफ्टवेयर पर लाया गया।

लैंड रिकॉर्ड कमिश्नरेट में मप्र की समस्त निजी व शासकीय जमीनों का लेखा-जोखा रखने और जिलों में मौजूद बंदोबस्त के रिकॉर्ड को मेंटेन करने का काम होता है। प्रदेश की विभिन्न योजनाओं के लिए लैंड बैंक बनाने का काम भी यहीं किया गया है। ऐसे में यहां फाइल वर्क बहुत ज्यादा होता है।

सबकी जिम्मेदारी तय: आवक शाखा में आने वाला पत्र हो या फिर ऑफिस की कोई फाइल सभी को स्कैन कर ई-ऑफिस सॉफ्टवेयर पर अपलोड किया जाता है। इसके बाद शुरू होता है ई-ऑफिस वर्क। इस सिस्टम में किस शाखा में कौन सी फाइल किस लिपिक या अफसर के पास है और वह कितने वक्त से है, इसे लैंड रिकॉर्ड कमिश्नर और अलग-अलग कार्यों के लिए ओआईसी बनाए गए एडिशनल कमिश्नर व डिप्टी कमिश्नर देख सकते हैं।

प्रदेश का पहला ऐसा दफ्तर

ये हो रहा है फायदा

समय की बचत। निर्धारित अवधि में फाइल का निराकरण। लिपिकों की मनमानी पर रोक। फाइल या पत्र नहीं मिलने की समस्या से छुटकारा।

शासन की मंशा के अनुरूप हमने लैंड रिकॉर्ड कार्यालय का सारा काम ऑनलाइन कर दिया है। हमारा ऑफिस अब पूरी तरह से पेपरलेस है। हमारे लिपिक हों या अफसर सभी कंप्यूटर पर ई-ऑफिस सॉफ्टवेयर पर काम कर रहे हैं। प्रदेश में पेपरलेस होने के मामले में लैंड रिकॉर्ड कार्यालय पहला दफ्तर बन गया है। एम.सेलवेंद्रम, कमिश्नर, लैंड रिकॉर्ड, मप्र

पेपर वर्किंग में क्या आ रही थी परेशानी: इंटरनल वर्किंग में 8 अलग-अलग सेक्शन के लिपिकों के बीच फाइल वर्क होता था। किसी योजना या किसी जमीन को लेकर कमिश्नर और दूसरे अफसरों व लिपिकों के बीच फाइलों के आदान-प्रदान में काफी वक्त लगता था। कई बार लिपिकों द्वारा समय पर जवाब नहीं देने, किसी जिले से आए पत्र या फाइल को समय से अफसरों के सामने प्रस्तुत नहीं करने की परेशानी आती थी। कई बार अफसर भी लेट-लतीफी कर देते थे।

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