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आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से जल्द निपटेंगे मामले ऑनलाइन होगा डाटा, जजों के पास रहेगा रिकॉर्ड

3 वर्ष पहले
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सिटी रिपोर्टर | ग्वालियर

दुनिया के कई देशों में आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस एडवोकेट बनाए गए हैं। इसके जरिए कितना भी पुराना डाटा सुरक्षित रखा जा सकता है। अब इससे आगे बढ़कर हमारे यहां जजों को आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से अपडेट रखना होगा। यह एक ऐसी टेक्नोलॉजी है, जिसमें वो केस रहते हैं जिनका फैसला आ चुका है। उदाहरण के तौर पर कोर्ट में किसी केस की सुनवाई हो रही है और जज उससे संबंधित केस के तथ्य देखना चाहते हैं तो वह एक क्लिक पर ऐसा कर सकेंगे। इससे केस की सुनवाई समय पर हो सकेगी और फैसला आने में समय भी नहीं लगेगा। यह बात आईपी जैकेट टेक्नोलॉजी इंडिया के चेयरमैन शशांक सिंह ने कही। वे रविवार को एमआईटीएस के स्टूडेंट्स एक्टिविटी सेंटर में डिजिटल ज्यूडीशियरी-बिल्डिंग स्मार्ट कोर्ट्स पर हुई नेशनल समिट में बोल रहे थे। इस मौके पर मुख्य अतिथि मप्र हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के जस्टिस विवेक अग्रवाल रहे।अध्यक्षता फॉर्मर जस्टिस बृजकिशोर दुबे ने की।

शशांक सिंह

नेशनल समिट प्रोग्राम को संबोधित करते मप्र उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति बृजकिशोर दुबे। एक दिवसीय यह प्रोग्राम दो सत्रों में हुआ।

एचटीटीपीएस का करें उपयोग

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन साइबर क्राइम एंड साइबर लॉ नोएडा के चेयरमैन व एडवोकेट अनुज अग्रवाल साइबर सिक्योरिटी पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि जब भी आप ऑनलाइन ट्रांजेक्शन करें तो वेबसाइट भी देख लें। इसके लिए एचटीटीपीएस का उपयोग करें। इसके पीछे जो एस जुड़ा है, वो सिक्योरिटी फीचर है। इसी तरह हम मोबाइल में जो एप्लीकेशन डाउनलोड करते हैं, उसके टर्म्स ध्यान से पढ़ें। कई बार उसमें यह भी बताया जाता है कि आप जो भी डाटा मोबाइल में रखेंगे उसे हम शेयर कर सकेंगे, लेकिन अधिकतर लोग इन टर्म को पढ़ते ही नहीं है। प्रोग्राम शहीद सुशील कुमार शर्मा फाउंउेशन, सीएसआई और माधव लॉ कॉलेज की ओर से कराया गया।

अन्य वक्ताओं ने भी रखे विचार

समिट में वेकॉम इंडिया दिल्ली के डायरेक्टर जितेंद्र शर्मा ने कहा कि एक ए-4 साइज का कागज बनाने में 20 लीटर पानी की जरूरत होती है। अगर कोर्ट पेपरलेस होंगी तो कितना पानी बचाया जा सकेगा। समिट में अहमदाबाद के धवल कोटेचा सहित अन्य वक्ताओं ने विचार रखे। कार्यक्रम में एसएसपी क्राइम ग्वालियर सुधीर अग्रवाल ने कहा कि साइबर क्राइम को लेकर हमारी समझ अभी काफी कम है। इसके लिए अभी अवेयरनेस करने की जरूरत है। इसलिए इस प्रकार के प्रोग्राम ज्यादा होने चाहिए।

सीसीटीवी कैमरे और सॉफ्टवेयर का तय किया जाता है स्टैंडर्ड

गुड़गांव से आए वीडियोनेटिक्स के वाइस प्रेसिडेंट अविनाश जे त्रिवेदी ने कहा कि सर्विलांस का ज्यूडीशियरी में पर हमें ध्यान देना होगा। सीसीटीवी फुटेज को बतौर एविडेंस तवज्जो मिले इसके लिए सीसीटीवी कैमरे का स्टैंडर्ड तय होना चाहिए। साथ ही वो वीडियो किस सॉफ्टवेयर में स्टॉरेज हो रहा है उसका भी मानक तय होना जरूरी है। इससे फायदा यह मिलेगा कि जब लोग सीसीटीवी लगवाएंगे तो उन्हें इसके मानक पता होंगे तो उनकी फुटेज कोर्ट में मान्य होंगे। एकाउंट की तरह सीसीटीवी कैमरे की ऑडिट भी करें।

आॅनलाइन हो सकेगा डाटा ट्रांसफर

मुख्य अतिथि मप्र हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के जस्टिस विवेक अग्रवाल ने कहा कि डिजिटलाइजेशन को फायदा यह होगा कि किसी भी केस में फैसला आते ही उसे वेबसाइट पर देखा जा सकेगा। अगर कोई व्यक्ति डीजे कोर्ट से हाईकोर्ट में अपील करता है तो डाटा ऑनलाइन ट्रांसफर हो सकेगा।

सुप्रीम कोर्ट में आईसीएमआईएस

एडवोकेट आलोक शर्मा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में इंटीग्रेटेड केस मैनेजमेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम (आईसीएमआईएस) अपनाया जा रहा है। हमारे यहां 2004 में ई-कोर्ट की शुरुआत हुई, लेकिन वर्तमान में डिजिटल ज्यूडीशियरी के लिए बेसिक ट्रेनिंग की जरूरत भी है। उन्होंने कहा कि देश के हाईकोर्ट में 40 प्रतिशत जस्टिस की सीट खाली हैं। 1 लाख 65 हजार केस एक हाईकोर्ट में पेंडिंग हैं जबकि 2.6 करोड़ केस सब ऑर्डिनेट कोर्ट में पेंडिंग हैं।

क्या है डिजिटल ज्यूडीशियरी

एक्सपर्ट अपूर्वा आघा ने कहा कि डिजिटल ज्यूडीशियरी में ई-रिकॉर्ड जनरेट होगा। इसके लिए कोर्ट में इंटर कनेक्शन के अलावा कोर्ट को पोर्टल से जोड़ा जाएगा। लोग कोर्ट की वेबसाइट पर केस नंबर डालकर केस की सुनवाई से अपडेट रह सकेंगे। केस के फैसलों की कॉपी पीडीएफ फाइल में बनेगी। अगर अपीलकर्ता आगे कोर्ट में अपील करता है तो केस का सारा रिकॉर्ड पीडीएफ फार्म में संबंधित कोर्ट को ट्रांसफर किया जा सकेगा।

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