हे देवी, हमें माफ करना...
ग्वालियर | ऊपर आप दो तस्वीरें देख रहे हैं। पहली तस्वीर 29 सितंबर 2017 की है, जब रमौआ डेम में शारदीय नवरात्रि के अंतिम दिन देवी प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया था। उस समय विसर्जन स्थल पर घुटने-घुटने पानी था। दूसरी तस्वीर आपको दुखी कर सकती है। यह बुधवार 16 मई 2018 की है जिसमें उसी देवी प्रतिमा के अंश दिखाई दे रहे हैं। इस प्रतिमा का पीओपी से बना चेहरा 229 दिन बाद भी पूरी तरह विसर्जित नहीं हुआ है। शास्त्रों में कहा गया है कि प्रतिमाओं का विसर्जन पानी या मिट्टी में पूरी तरह से होना चाहिए। लेकिन दुख का विषय है कि हमारे जलाशयों में पानी नहीं होने के बावजूद प्रतिमाएं विसर्जित की जाती हैं। वे पूरी तरह गल नहीं पातीं और बाद में ऐसी अवस्था में दिखाई देने लगती हैं। इन्हें देखकर कहीं न कहीं हमारी आस्था और भावनाओं को ठेस पहुंचती है।
रमौआ डेम में शारदीय नवरात्रि पर विसर्जित प्रतिमा का 229 दिन बाद भी ये है हाल
प्रतिमा का हाल : 16 मई 2018
भास्कर विचार
दैनिक भास्कर हर साल ‘मिट्टी के गणेश, घर में ही विसर्जन’ का अभियान चलाता आ रहा है। भास्कर एक बार फिर यह बात दोहराना चाहता है कि पीओपी से बनीं प्रतिमाओं से पर्यावरण और धर्म दोनों का नुकसान हो रहा है। चाहे वह प्रतिमाएं भगवान गणेश की हों या देवी की। मिट्टी की मूर्तियों के बारे में भी भास्कर यही निवेदन करता रहा है कि उसका विसर्जन घर मेंं ही करें। क्योंकि जब मिट्टी बांध, तालाब, झील या नदियों में डालते हैं, तो उसमें भराव के कारण पानी की मात्रा कम होने लगती है। और जब आप घर में ही विसर्जन करते हैं तो ईश्वर के रूप में पवित्र मिट्टी सदैव हमारे घर के गमलों और क्यारियों में ही बनी रहती है। दैनिक भास्कर आगे भी इस बात को आप तक पहुंचाता रहेगा। हम लगातार यह अभियान चलाते रहेंगे कि प्रतिमाएं मिट्टी की बनें और उनका विसर्जन घर में ही हो। ताकि हम अपने बांध और तालाबाें के साथ ही आस्था को भी बचा सकें।
मिट्टी की छोटी प्रतिमाएं लाएं, घर में करें विसर्जन, तो नहीं दिखेंगे ऐसे दृश्य
फोटो: विक्रम प्रजापति