- Hindi News
- National
- अस्पताल में ढाई माह पहले पीपीपी मोड पर शुरू किया डायलिसिस सेंटर डॉक्टर लगाया नहीं, लापरवाही जांच से उपचार तक सब टेक्नीशियन कर रहे
अस्पताल में ढाई माह पहले पीपीपी मोड पर शुरू किया डायलिसिस सेंटर डॉक्टर लगाया नहीं, लापरवाही- जांच से उपचार तक सब टेक्नीशियन कर रहे
जिला अस्पताल में पीपीपी (प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप) मोड पर खोला गया डायलिसिस सेंटर बिना नेफ्रोलॉजिस्ट डॉक्टर के चल रहा है। हैरानी यह है कि सेंटर खोलने वाली कंपनी ने यहां एक भी नेफ्रोलॉजिस्ट व प्रशिक्षित डॉक्टर को तैनात नहीं है। ऐेसे में टेक्नीशियन ही रोगियों की डायलिसिस कर रहे हैं।
किडनी की बीमारियों से ग्रस्त रोगियों को निजी अस्पतालों में महंगे उपचार से बचाने के लिए सरकार ने यह सेंटर पीपीपी मोड पर खुलवाया है लेकिन जिम्मेदार अधिकारी इसकी मॉनिटरिंग नहीं कर रहे हैं। यही कारण है कि डॉक्टर नहीं होने के बावजूद डायलिसिस की जा रही है। सेंटर का लोकार्पण गत तीन मार्च को हुआ था। ऐसे में पिछले ढाई माह से यह सेंटर बिना डॉक्टर के चल रहा है। जिले में किडनी रोग से पीड़ित रोगियों के फायदे के लिए सरकार ने जिला अस्पताल में पीपीपी मोड पर डायलिसिस सेंटर खोलने की घोषणा की थी। सेंटर संचालन के लिए चंडीगढ़ की एक कंपनी से एमओयू किया गया लेकिन इसकी मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग की है। हालांकि स्थानीय अधिकारी निदेशालय स्तर पर एमओयू होने का कहकर जिम्मेदारी से बच रहे हैं।
डायलिसिस के दौरान इन 3 खतरों की आशंका, जिसे केवल डॉक्टर ही कम कर सकते हैं
1.बीपी कम या ज्यादा होना|ब्लड प्रेशर कम या ज्यादा होने पर रोगी का जीवन खतरे में रहता है। डॉक्टर की ओर से संभाल नहीं किए जाने पर जान भी जा सकती है।
2.हार्ट की पावर कम होना| किडनी रोगी के हार्ट की पावर कम हो जाती है। ऐसे में डॉक्टर ऐसे रोगियों की रेगुलर जांच के बाद डायलिसिस की सलाह देते हैं।
3.पोटेशन बढ़ना| किडनी रोगियों का कई बार पोटेशन बढ़ जाता है। ऐसे रोगी की पोटेशन फ्री डायलिसिस की जाती है।
कंपनी ने छह मशीनें लगाने का किया था दावा, खुद की एक भी नहीं लगाई, दो सरकारी मशीनों से ही चला रहे काम : हीमो डायलिसिस सेंटर में वर्तमान में दो डायलिसिस मशीन ही हैं। करीब 20 लाख रुपए कीमत की यह दोनों मशीनें सरकारी हैं जोकि अस्पताल प्रशासन ने निदेशालय के निर्देश पर कंपनी को सौंपी हैं। पिछले ढ़ाई माह से इन दो मशीनों पर ही रोगियों की डायलिसिस की जा रही है। वहीं आरओ प्लांट भी सरकार का है। हालांकि कंपनी ने यहां पर छह मशीनें लगाए जाने का दावा किया था। हीमो डायलिसिस सेंटर में रोजाना चार से पांच रोगियों की डायलिसिस हो रही है। इस तरह से हर माह औसतन 150 डायलिसिस हो रही है।
एक्सपर्ट भी बोले- सेंटर में डायलिसिस होते समय तो डॉक्टर का होना बेहद ही जरूरी
वरिष्ठ डॉक्टर प्रतापसिंह शेखावत का कहना है कि डायलिसिस सेंटर में डॉक्टर नहीं होना रोगी के लिए नुकसानदेह हो सकता है। डायलिसिस टेक्नीशियन ही करते हैं लेकिन उस समय डॉक्टर का होना इसलिए आवश्यक है कि कई बार रोगी का बीपी कम व ज्यादा हो जाता है। वहीं ऐसी स्थिति में किडनी रोगी के हार्ट की पावर भी कम हो जाती है। वहीं कई रोगियों का पोटेशन भी बढ़ जाता है। ऐसे में डॉक्टर पोटेशन फ्री डायलिसिस की भी सलाह देते हैं। रोगी की स्थिति देखकर के अनुरूप ही डॉक्टर डायलिसिस की सलाह देते हैं।
पीएमओ बोले- निदेशालय स्तर पर हुआ एमओयू, कंपनी के प्रतिनिधि ही इस बारे में बताएंगे, हमें जानकारी नहीं है
कार्यवाहक पीएमओ डॉ. दीपकमित्र सैनी का कहना है कि हीमो डायलिसिस सेंटर का एमओयू निदेशालय स्तर पर हुआ है। निदेशालय के निर्देश पर सेंटर के लिए जगह उपलब्ध कराने के साथ ही सरकार की ओर से भेजा गया आरओ प्लांट और दो डायलिसिस मशीनें कंपनी को सौंप दी गई। इसकी जानकारी वही दे सकते हैं, जिस कंपनी से एमओयू हुआ है।
कंपनी आरएम बोले- अगर किसी की डायलिसिस के दौरान तबीयत बिगड़ती है तो उस आईसीयू में रेफर कर देंगे
कंपनी आरएम रूपिंद्रपाल सिंह का कहना है कि डॉक्टर्स भी इंसान हैं। उनकी भी कई तरह के काम होते हैं। डॉक्टर कोई इश्यू नहीं हैं। श्रीगंगानगर से डॉक्टर संदीप बैकअप दे रही हैं। डायलिसिस टेक्नीशियन ही करते हैं और डॉक्टर को ऑन ड्यूटी रहना होता है। पीजी एग्जाम होने के बाद डॉक्टर ज्वाइन कर लेंगे। अगर किसी रोगी की डायलिसिस के दौरान तबीयत बिगड़ती है तो उसे सिविल अस्पताल के आईसीयू में रेफर करेंगे।
सूत्रों के मुताबिक सेंटर में एक नेफ्रोलॉजिस्ट डॉक्टर और एक फिजीशियन डॉक्टर भी हर समय मौजूद रहना आवश्यक है, लेकिन यह सेंटर महज एक टेक्नीशियन व दो नर्सिंग स्टाफ के भरोसे चलाया जा रहा है। सेंटर में वर्तमान में मैनेजर सहित पांच जनों का स्टाफ है।
जिम्मेदारों के गैर जिम्मेदार बयान
सुविधाएं बढ़ें तो मिले रोगियों को फायदा, प्राइवेट अस्पताल में नहीं कराना पड़ेगा महंगा इलाज : इस सेंटर में एक बार डायलिसिस करने के बदले में एपीएल रोगियों से 1080 रुपए वसूले जाते हैं जबकि निजी अस्पतालों में डायलिसिस के लिए तीन से चार हजार रुपए लिए जाते हैं। वहीं बीपीएल, महिला, सीनियर सिटीजन, लावारिस, कैदी, आस्था कार्ड धारी रोगियों के लिए हीमो डायलिसिस की सुविधा निशुल्क है। ऐसे में यदि यहां पर नेफ्रोलॉजिस्ट व फिजिशियन डॉक्टर के साथ अन्य सुविधाएं कंपनी जुटा दे तो यह जिले के किडनी रोगियों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है। जिससे किडनी रोगों से पीड़ित मरीजों के परिजनों की निजी अस्पताल में महंगे उपचार से बचाया जा सकता है।