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देश में साढ़े 11 लाख करोड़ रुपए के एनपीए केस, जिसमें 40 घरानों के पास 4.50 लाख करोड़, बढ़ते एनपीए केस से दबाव में हैं बैंकर्स

3 वर्ष पहले
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हिसार | देश में साढ़े 11 लाख करोड़ रुपए के एनपीए केस बैंकों में लंबित हैं। जिसमें से देश के 40 घरानों के पास 4.50 लाख रुपए अटके हुए हैं। विजय माल्या व नीरव मोदी के देश छोड़ने के बाद बैंकिंग सिस्टम पर सवाल उठ रहे हैं। हालत यह है कि इन मामलों के चलते बैंकर्स दबाव में हैं। शुक्रवार को ऑल इंडिया पंजाब नेशनल बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन की त्रैमासिक कान्फ्रेंस अायोजित हुई, जिसमें देशभर में 3 लाख बैंकिंग ऑफिसर्स का प्रतिनिधित्व करने वाले ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कन्फैडरेशन के प्रेसीडेंट दिलीप साहा ने भाग लिया। उन्होंने बताया कि अगर सरकार या आरबीआई ने सख्त नियम नहीं लाए तो बैंकिंग सिस्टम लड़खड़ा जाएगा। आरबीआई को 8 से 10 महीनों में हमने कई चिट्ठी लिखीं मगर कोई सुनवाई नहीं हुई। इस दौरान ऑल इंडिया पंजाब नेशनल बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के सर्कल प्रेसीडेंट कामरेड एसके जैन भी उपस्थित रहे।

दिलीप साहा।

इन 4 बिंदुओं से समझिए बैंकर्स क्यों हैं दबाव में किसान ही
क्यों कॉरपोरेट क्यों नहीं करते सुसाइड : एनपीए के लिए सरकार अगर कोई सख्त कानून नहीं लाती है ताे बैंकिंग सिस्टम चरमरा जाएगा। मौजूदा समय में रिकवरी के जो नियम हैं उनसे वही लोग प्रभावित हो रहे हैं जिनके पास मैकेनिज्म नहीं है, वरना उद्योगपतियों को कभी लोन के कारण सुसाइड करते देखा है। क्योंकि उनके पास सिस्टम है बड़ी टीम है जो बाहर निकलने का रास्ता दिखा देती है। यह लोग कानून से खेलना जानते हैं। जब यह बच जाते हैं तो दोष यही आता है कि बैंक के अधिकारियों ने बचाया होगा

इकॉनोमिक ऑफेंस काे रोकने का काम बैंकर्स नहीं करेंगे : नीरव मोदी या विजय माल्या जैसे लोगों को ऋण देने का काम बैंक ने किया, मगर उन्होंने इकोनॉमिक ऑफेंस के मामलों में तो सरकार काे किसी और ही सिस्टम का सहारा लेना होगा। एनपीए होने के बावजूद अगर कोई भाग जाता है तो इसमें बैंकर्स पकड़ने का काम तो नहीं करेंगे।

सोशल बिजनेस के बाद भी प्राइवेट से तुलना: सालभर हमने जनधन का काम, मुद्रा लोन, डीमॉनिटाइजेशन, एपीआई बिक्री और अब आधार का एनरोलमेंट जैसे काम मेहनत से किए, मगर बैंक 12 महीने यह काम करेंगे तो सरकार यह तो न कहे कि आपकी बैलेंसशीट को किसी प्राइवेट बैंक की बैलेंसशीट से मिलान करेंगे। फिर प्रोफिट कम बैठे तो अलग दबाव बन जाता है, जबकि हम तो सोशल बिजनेस कर रहे हैं।

बैंकिंग कर्मचारियों के लिए बदल रहे नियम : नीरव मोदी के प्रकरण में आईबोक प्रेसीडेंट का कहना है कि हमें शर्म है कि पीएनबी से ऐसे अधिकारी जुड़े हुए थे। इस घटना के बाद पीएनबी अपने सिस्टम को और सख्त करने जा रही है, जिसमें इस प्रकार के ऋण के लिए कई बैंकर्स की अनुमति चाहिए होगी। इस पर प्राइवेट बैंक ने भी काम शुरू किया है। उन्होंने बताया कि कई वर्षों में ऐसे मामले होते हैं मगर इस खतरे में भी बैंक का उपभोक्ताओं ने साथ दिया है।

ये है एनपीए
बैंक व्यक्तियों को लोन देने का कार्य करती है। कभी-कभी ऐसा होता है कि लोन लेना वाला व्यक्ति बैंक को धनराशि का निरंतर भुगतान नहीं कर पाता है। इसके बाद बैंक उसे एक कानूनी कार्रवाई की हिदायत देते हुए नोटिस भेजती है। इसके बाद भी जब भुगतान नहीं होता तब वह एनपीए की श्रेणी में आता है। यानि ऋण की राशि व ब्याज चुकाने में नाकामयाब हो जाता है तो बैंक उस लोन को नॉन परफार्मिंग एसेट्स करार देती है।

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