डायाफ्रेगमेटिक हर्निया विशेष रूप से उत्तर भारत में जानवरों का एक गंभीर पाचन विकार है। इस रोग से पशुओं के शरीर में स्थित एक मुख्य अंग डायाफ्राम के मस्कुलर-टेंडिनस जंक्शन पर टूटने से पेट के कुछ हिस्से छाती में जाकर पशु के ह्रदय की क्रिया प्रणाली व श्वसन क्रिया में बाधा उत्पन्न करते हैं। इस रोग से आमतौर पर अधिकतर पशुओं की मृत्यु हो जाती है। दरअसल भैसों के अलावा अन्य पालतू जानवरों को भी यह रोग हो सकता है। इस ऑपरेशन से मृत्यु दर पहले काफी अधिक होती थी, वर्तमान में पूर्व की अपेक्षा मृत्यु रिस्क काफी कम हो गया है। अगर कोई जानवर लंबे समय से पेट में अफारा की समस्या से ग्रस्त हो तो पशु पालक जानवर को लुवास विश्वविद्यालय के पशु चिकित्सालय में लाकर इस रोग का निदान करवा सकते हैं ताकि समय रहते पशु का समुचित इलाज किया जा सके।
लुवास के वैज्ञानिक ऑपरेशन थिएटर में भैंस के पेट में हार्निया का उपचार करते हुए।
लुवास के वैज्ञानिकों ने कैसे किया आॅपरेशन
डायफ्रागमैटिक हर्निया का उपचार एक लंबी अवधि की जटिल सर्जिकल प्रक्रिया है। रूमिनेंट्स में एनेस्थीसिया हमेशा एक चुनौती पूर्ण मुद्दा रहा है। इस प्रक्रिया में परिणाम सर्जिकल प्रक्रिया की तुलना में एनेस्थीसिया से सफल वापसी पर अधिक निर्भर करता है। इसके इलाज के प्रयास लुवास के पशुचिकित्साल्य एवं विकिरण विज्ञान विभाग द्वारा 80 के दशक में शुरू किए गए। प्रारंभ में बेहोशी केवल इंजेक्शन दवाओं के साथ प्रेरित और बनाए रखी जाती थी। इस प्रकार की सर्जरी के दौरान और बाद में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता। इसमें ऑपरेशन के बाद पशु की वापसी की संभावना कम ही है। इस ऑपरेशन को सफल बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने नई दवाइयां इजाद की। जिन्हें सांस नली के माध्यम से पशुओं को दिया गया। इस प्रक्रिया में डायफ्रागमैटिक हर्निया से ग्रस्त भैंसों के स्वस्थ होने की संभावना बढ़ जाती है। जिसे पशु पालकों को आर्थिक नुकसान भी नही होता।
कैसे होता है हार्निया
यह मुख्य रूप से गर्भवती और स्तन पान कराने वाले भैंसों की घातक बीमारी है। जिसमें कोई औषधीय उपचार नहीं है। यह ग्रामीण आंचल में पालन किए जाने वाली भैंसों की एक बड़ी समस्या है। इस अवस्था में पशु की मृत्यु से पशुपालकों नुकसान उठाना पड़ता है।