भास्कर संवाददाता | होशंगाबाद
अपने काम से होशंगाबाद को देश दुनिया में पहचान दिलाने वाले भू-वैज्ञानिक डॉ. अरुण सोनकिया नहीं रहे। शनिवार को हरदा रोड पर सड़क हादसे में निधन हो गया। उन्होंने उत्तर दिशा में नर्मदा नदी के तट पर बसे हथनौरा में 5 दिसंबर 1982 में मानव जीवाश्म की खोज की थी। इसके लिए उन्हें राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित भी किया था। शनिवार को वह पैतृक गांव हिरनखेड़ा सिवनीमालवा आए हुए थे। वह घर से शनिवार दोपहर 12 बजे मारूति कार (एमएच 31 एजी 8961 ) से भोपाल जाने के लिए निकले थे, लेकिन दोपहर 2 बजे टुगारिया जाने वाले रोड के पास ट्रक (एमपी 09 एचएफ 8216) ने टक्कर मार दी। इससे उनकी मौत हो गई। घटना में वे कार में दब चुके थे, उन्हें राहगीरों ने बाहर निकाला, लेकिन जब तक इमरजेंसी 108 पहुंचती उनकी मौके पर ही मौत हो गई। घटना स्थल पर देहात थाने की बीट और डायल 100 भी पहुंची। घटना का कारण ट्रक के अनियंत्रित होना बताया जा रहा है। हादसे में दस चक्का ट्रक के पीछे के दोनों चक्के टूट गए हैं। ट्रक चालक फरार हो गया। एसआई ब्रजेश उइके ने बताया ट्रक चालक मौके से भाग निकला है। मर्ग कायम कर मामले में जांच की जा रही है। पीएम करवाकर शव परिजनों को सौंप दिया। घटना में पूरी कार डेमेज हो गई है। आरोपी ट्रक चालक फरार हो गया है।
मानव जीवाश्म की खोज करने वाले भू-वैज्ञानिक डॉ. अरुण सोनकिया।
मानव जन्म भारत के हथनोरा में हुआ
नर्मदा मानव को खोजने वाले डॉ. सोनकिया विश्व के पटल पर उनकी मानव जीवन भारत में नर्मदा किनारे की खोज हमेशा जीवंत रहेगी। नर्मदा घाटी में जीवाश्मों में हाथी, घोड़े, दरियाई घोड़ा, जंगली भैंसों के जीवाश्म के साथ सीहोर के हथनोरा में 5 दिसंबर 1982 को 70 हजार वर्ष पुराने मानव के कपाल अवशेष खोजे थे। हथनोरा में नर्मदा तट पर खुदाई से मानव कपाल निकाला। प्राचीन मानव को वैज्ञानिकों द्वारा नर्मदा मानव का नाम दिया गया है। हथनोरा के सामने के धांसी और सूरजकुंड में नर्मदा के उत्तरी तट पर प्राचीनतम विलुप्त हाथी (स्टेगोडॉन) के दोनों दांत तथा ऊपरी जबड़े का जीवाश्म भी उन्होंने खोजा।
5 दिसंबर 1982 को नर्मदा मानव की 5 लाख साल पुरानी खोपड़ी खोजी थी। ग्रामीण शिवनारायण मीना के हाथ में रखी खोपड़ी दिखाते भू-वैज्ञानिक डॉ. अरुण सोनकिया। खोज के दौरान का फोटो बनेठा पंचायत सचिव शिवनारायण मीना के एलबम से संग्रहित की।
सोनकिया ने बताया अफ्रीका नहीं भारत में जन्मा है मानव
भारत में सर्वप्रथम वर्ष 1982 में नर्मदा नदी घाटी के किनारे बसे हथनोरा गांव से आदि मानव की उत्पत्ति की जानकारी मिली । हथनोरा गांव से आदि मानव के कंकाल (खोपड़ी का भाग) मिले , जिसका आकलन इएसआर(इलेक्ट्रॉन स्पीन रेजोलेंस) डेटिंग पद्धति से किया था। जिससे पता चला कि यह कंकाल 3,50,000 वर्ष पुराना है। यहीं से मानव के विकास की कहानी भारत में शुरू होती है। तब डॉ अरुण सोनकिया ने बताया था की इससे पूर्व आदि मानव की उत्पत्ति की जानकारी पूर्वी अफ्रीका के तंजानिया अंतर्गत ओल्डवाईगॉज नामक स्थान से मिलती रही है। यहां के बाद से आदि मानव के सउदी अरब होते हुए भारत आने की जानकारियां मिलती हैं। भारत के बाद यह आदि मानव चीन से आगे जाने के साक्ष्य मिलते हैं। इस खोज ने यह घारणा को बदल दिया ।
पूर्व मंत्री काकू भाई के रिश्तेदार
डॉ. अरूण सोनकिया कांग्रेस नेता और पूर्व गृह राज्य मंत्री विजय दुबे काकू भाई के रिश्तेदार भी थे। डॉ. सोनकिया विजय दुबे काकू भाई के एक रिस्ते में बहनाेई लगते थे। हादसे के बाद उनके परिवार के कई सदस्य जिला अस्पताल पहुंचे।
डॉ. सोनकिया ने खोजा था 5 लाख वर्ष पुरानी महिला का जीवाश्म
5 दिसंबर 1982 को भूवैज्ञानिक अरुण सोनकिया को हथनोरा में एशूली औजार और मानवसम खोपड़ी लगभग 30 वर्ष की महिला की मिली। सोनकिया ने बड़े मस्तिष्क की क्षमता आकार 1155 से 1421 सीसी से ये बताया महिला होमो इरेक्टस की विकसित रही थी। इसलिए उसका नाम होमो इरेक्टस नर्मदेनिसिस रखा। नर्मदा मानव की 5 लाख साल पुरानी खोपड़ी आज भी मानव विज्ञान संग्रहालय नागपुर में देखी जा सकती है। भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण ने सिविल लाइंस में इसे स्थापित किया है। 5 लाख साल पुरानी खोपड़ी के दाहिने भाग का एक हिस्सा मानव विज्ञान संग्रहालय में है। खोपड़ी भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के डॉ. अरुण सोनकिया को हथनोरा में नर्मदा के तट से मिली । मानव की उत्पत्ति, जीवन विकास, संस्कृति से जुड़ी अनेक प्राचीन धरोहर संग्रहालय में रखी है।
मकान निर्माण का बयाना देने आए थे गांव
डॉ. अरुण के परिवार में उनकी प|ी कृष्णा सोनकिया, बड़ा बेटा सिद्धार्थ,विवेक और बेटी श्वेता है। संझले भाई अनिल सोनकिया ने बताया वह 4 भाई थे। वह भोपाल की अपेक्स बैंक कॉलोनी रोहित नगर के पास सहयोग बिहार कॉलोनी में मकान नंबर 3 में रहते हैं। उनके बेटे विवेक और विनायक ने बताया डॉ. अरुण अपने पैतृक मकान का पुर्ननिर्माण करा रहे थे। बयाना देने के लिए गांव आए थे।