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लागत कम, सरकारी दखल नहीं तो मुनाफा ही मुनाफा

3 वर्ष पहले
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सूबे में रेत के ठेके दूसरे सभी ठेकों से ज्यादा कमाई का साधन बन चुके हैं। कारण है सरकार की कोई माइनिंग पॉलिसी नहीं होना। ठेकेदार एक बार रेत का ठेका लेने के बाद अपनी मर्जी से रेत के दाम तय करता है। यही नहीं माइनिंग के दौरान कोई चेकिंग न होने के कारण ठेकेदार नियमों के बाहर जाकर अवैध माइनिंग करते हैं। इस कारण सूबा सरकार को तो चूना लगता है लेकिन आम जनता पर भी इसका बोझ बढ़ जाता है। सबसे ज्यादा फायदा उठाते हैं ठेकेदार। यही नहीं इस धंधे में राजनीतिक लोगों के जुड़े होने के कारण भी इस अ‌वैध माइनिंग के धंधे पर कोई रोक नहीं लग पा रही।

पंजाब भर में कितना करोड़ का है यह कारोबार
रेत का धंधा
इन्फो न्यूज
सबसे छोटी बोली

जालंधर के शाहकोट में थम्मूवाल खड्‌ड 14 करोड़ रुपये में अलॉट हुई थी। बाद में ठेकेदार काम छोड़ गया

5 साल ‌पहले Rs.‌15 फीट औसतन थे

रेत के दाम पर सरकार का कोई कंट्रोल नहीं है। यह ठेकेदार पर है कि वह किस दाम पर रेत बेचता है।

पंजाब में सतलुज, रावि, ब्यास, सवां नदियों से रेत निकलती है। मेन रकबा सतलुज का है।

क्या हैं माइनिंग के नियम

सबसे पहले जहां रेत खनन का ठेका देना है, इसका एरिया तय होता है। ये औसतन 5 से 10 एकड़ होता है। फिर इसमें रेत का भंडार देखकर इसकी रिजर्व कीमत तय होती है। ऑनलाइन आक्शन में जो लोग ज्यादा से ज्यादा आफर देते हैं, फिर इसे ये खदान दी जाती है।

कितना पैसा देना होता है

आरक्षित रकम जमा करानी होती है। ये हर खदान की अलग होती है। कोई भी शख्स खनन का ठेका ले सकता है। बस इससे सीए सर्टिफिकेट लिया जाता है। इसमें खनन की तिमाही किश्त जमा कराने की क्षमता होनी चाहिए।

अलॉट खदानें

59

ठेका दिया

371 करोड़ में

कुल रेत निकाली जाएगी

77,26,718 करोड़ टन

अवैध माइनिंग के चलते कारोबार साल में होता है

करीब Rs.11000 करोड़

सबसे बड़ी बोली

संगोवाल 37 लाख 20 हजार में अलॉट हुई। हर खदान 5 साल के लिए अलॉट होती है।

रेत के रेट
अब ये 30 रुपये पर आ गए हैं

जालंधर, नवांशहर, मोगा, लुधियाना, फिरोजपुर, होशियारपुर, पठानकोट खनन के मेन इलाके हैं।

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