यह महफ़िल वाकई मुख़्तलिफ़ थी शहर में होने वाली तमाम सुखन की महफिलों से। यहां साहिर, दुष्यंत कुमार, हरिवंशराय बच्चन, निदा फ़ाज़ली और जावेद अख़्तर की वही ग़ज़लें-नज़्में पढ़ी गईं जिन्हें पढ़कर एक ज़माने में जवां दिल इश्क करना सीखते थे, दिल की कहना की सीखते थे। अश्आर वही थे, लेकिन आज सुनानेवाले भी अलग थे और सुननेवाले भी। सुना रहे थे आईआईएम प्रोफेसर्स, कॉर्पोरेट ट्रेनर्स और सुननेवाले थे प्रोफेशनल्स-मैनेजर्स। खुली छत पर गर्मी की शाम, साफ आसमान में खिला चांद, मद्धम रोशनी, साहिर के अश्आर और इन कविताओं के लगभग नए सुनकार। शायद यही वजह रही कि कुछ हल्के अश्आर भी तालियां लूट ले गए।
बहरहाल इंदौर मैनेजमेंट एसोसिएशन बधाई का हक़दार इसलिए है कि कविता से मैनेजमेंट के गुर सिखाने का कॉन्सेप्ट नया था। ऑफिस के प्रेशर से लेकर, परिवार को समय न दे पाने, बॉस की डांट खाने, अहंकार के गिरफ्त में आ जाने और इस भुतालिए से तंग आकर इस्तीफा दे डालने के लिए भी कविताएं पढ़ी गईं। आप भी नज़र फरमाएं कैसे कविताएं प्रबंधन भी सिखाती हैं :
साहिर-दुष्यंत की कविताओं से सीखे मैनेजमेंट के गुर
वर्क प्रेशर से लेकर, परिवार को समय न दे पाने और आलोचना व अहंकार पर भी कविताएं
संदीप अत्रे ने कहा \\\"कविताएं हम पर गहरा असर इसलिए करती हैं क्योंकि जब कोई हमारी अहसास को लफ्ज़ दे देता है तो हमें आनंद आता है। खुशी होती है कि कोई है जो मुझे समझता है। इमोशनल कॉशंट डेवलप करने के लिए हम जैसों को बुलाते हैं मैनेजर्स। लेकिन शुरुआत से ही उन्हें साहिर और दुष्यंत जैसे सुखनवरों का लिखा सुनाया जाए तो ज़रूरत ही क्या है हमारी। कविताएं पहले हमें समझती हैं और फिर हमें समझाती हैं। कविता सवाल भी करती है। हमें छूती है, जगाए रखती है।
जब आप बनना चाहते थे आंत्रप्रेन्योर और करना पड़ रही है नौकरी तब फ्रस्ट्रेशन आता है। निदा फ़ाज़ली का यह शेर इसी बारे में कहता है
शिकायत : जब किसी से कोई गिला रखना, सामने अपने आईना रखना।
जजमेंटल होना : परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता, किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता।
बेतकल्लुफी : कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो मिलोगे तपाक से, ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो
कटु शब्द : सबद-सबद सब कोई, सबद के हाथ न पांव/ एक सबद औषध करे, एक सबद घाव।
• जंगल से महफूज़ था पिंजरा लेकिन इसी हिफ़ाज़त में, खुली हवा का एक परिंदा परों से उड़ना भूल गया।
वर्क लाइफ बैलेंस पर कविता
\\\"कहीं होकर वहां होना मयस्सर अब कहां हमको, कि अब तो फिरते रहते हैं, ज़हन के हर इशारे पर/ कभी यादों के उस लम्हे में जो सुलझा नहीं अब तक, कभी अपने तसव्वुर की किन्हीं अनजान गलियों में भटकते रहते हैं बेसबब से अनमने से हम, कि बेतरतीब सी इक ज़िंदगी के सिलसिले से हम/ कहीं होकर वहां मौजूद होना एक नेमत है, ये पहली शर्त है दिल के सुकूं की खुशमिज़ाजी की/ ये पहली शर्त है मकबूलियत की, कामयाबी की।\\\'
कविता सवाल भी उठाती है : ये ज़िंदगी आज जो तुम्हारे बदन की छोटी-बड़ी नसों में मचल रही है, तुम्हारे पैरों से चल रही है/ तुम्हारे लफ्जों में ढल रही है/ ये ज़िंदगी जाने कितनी सदियों से यूं ही शक्लें बदल रही हैं।
आलोचना : मत कहो आकाश में कोहरा घना है/ यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।
रिकग्निशन न मिलना : आश्चर्य क्या कि जग हमारे आग मन पर है मौन/ सूर्य की पहली किरण पहचानता है कौन ?
होम सिकनेस : नई-नई आंतें हो तो सब अच्छा लगता है/ कुछ दिन शहर में घूमे, पर अब घर अच्छा लगता है।
• बॉस जब डांटते हैं तो बुरा तो लगता है, हमसे अनुभवी शख्स डांटे तो वो हमारे वजूद को बहुत कुछ दे जाता है :
• बारिश होती है तो पत्ते देर तलक बूंद-बूंद टपकते रहते हैं/ दर्द छिपाना आसां नहीं होता, बरसों में मगर इसी बारिश ने जड़ों को ज़मीन से जुड़ने की वजह दी है/ दर्द की यह भी पहचान होती है।