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मैंगो जत्रा में आए किस्सागो से सुनिए आम के खास किस्से

3 वर्ष पहले
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मैंगो जत्रा में दूसरे दिन भारी भीड़ रही। शहर से हज़ारों लोग मिठास के इस उत्सव में आए। आम स्लाइसेस के स्टॉल पर आम खाते जाते और सुनाते जाते अपने बचपन के दिनों के आम के किस्से।

आंगन में लगे आम के पेड़ों के किस्से, गर्मी की छुटि्टयों और आम की पाल के किस्से, आम महक से स्वाद की परख करने के किस्से। ऐसे ही कुछ किस्सागो से हम भी मिले। उनकी स्मृतियों में आम से जुड़ी खास यादें जज़्ब हैं। किस्से सुनाते हुए उनकी आंखों में वही चमक दिख रही थी जैसी बचपन में कैरियों से लदे पेड़ को देखकर आती थी। मैंगो जत्रा में आए इन किस्सागो से सुनिए आम के खास किस्से :

महक से बता सकता हूं आम कौन सा है और मीठा है या नहीं

लंगड़ा, सफेदा, सिंदूरी, नूरजहां सब आम खूब खाए हैं। डाइबिटीज़ हो गई इसलिए अब एक दो स्लाइस ही खा पाता हूं। बहुत बुरा लगता है, लेकिन क्या करें। बचपन में हमारे भाईजी (पिता) आम लाते तो उन्हें खाने का कायदा, उनका स्वाद, उनकी गंध के बारे में भी बताते। उन्हें सुनना भी मजेदार होता था। आम की महक से स्वाद का अंदाज़ा लगाना। जैसे कलमी आम में हल्का फीकापन और हल्की खटास होती है। लंगड़ा अाम सौंधा होता है। भाईजी बताते थे कि एक बारिश के बाद आमों की मिठास बढ़ जाती है। हालांकि फिर आम कुछ ही दिन आते हैं। आम का रस दो तीन किस्में मिलाकर बनाएं तो स्वादिष्ट लगता है।

- केशव सोलंकी

आम के आम गुठलियों के दाम वाली चीज़ है फजीता

आम का चीक धोए बगैर खा लेने से होठों के आसपास फुंसियां हो जाती हैं। हमारे घर में पेड़ थे इसलिए पाल बिछती थी। पानी के तपेले लेकर बैठते थे हम आम खाने। कई बार यूं ही खा लेते थे। बगैर धोए, लेकिन चीक लगने से होठों पर हुई समस्या चोरी पकड़वा देती थी। फिर दादाजी डांट लगाते थे। एक रेसिपी मैं बताती हूं जो आम से बनती है। नाम है फ़जीता। देसी आम जो टोरी कॉर्नर पर मिलते हैं, उनके रस में थोड़ी शकर और अमचूर डालकर शुद्ध घी में मीठे नीम, हरी मिर्च का छौंका लगाकर रस डाल दें। नमक और थोड़ा गर्म मसाला डालें। फिर आम की गुठलियां डालकर बॉइल कर लीजिए। सूप जितना पतला रहने दें और पिएं। गुठलियां भी चूसें। मज़ा आ जाएगा।

- श्यामा खंडेलवाल

पूरा मोहल्ला करता है आम के पेड़ की रखवाली

उषानगर में रहने वाले सत्यनारायण शर्मा के आंगन में 20 वर्ष पुराना आम का एक पेड़ है। जिस बरस भी आम की फसल इसमें आती है, लटालूम आती है। करीब डेढ़ से दो क्विंटल फल होते हैं। पूरा मोहल्ला आमों की रखवाली करता है। पकने पर बागोरा जी, बिंगले साहब, पांडे जी, तिवारी जी, दावानी जी, तायली दोरकर सहित सभी को आम बांटे जाते हैं। अपना हिस्सा मिल सके इसलिए सभी मिलकर आमचोरों पर नज़र रखते हैं। रिटायर्ड बैंककर्मी एसएन शर्मा बताते हैं, कि आम आने पर मेरे डेढ़ से दो महीने उन्हें संभालने में ही गुज़रते हैं। मजदूरों को बुलवाकर थोड़े कच्चे आम उतरवाना, पाल पर रखना, उन्हें देखते रहना कि कही स्वाद उतर ना जाए। उन्हें साफ करवाना और मोहल्ले, रिश्तेदारों में बंटवाना भी एक काम है।

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