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गायन में अभाेगी कान्हड़ा और वायलिन पर मालकौंस सुनाया

3 वर्ष पहले
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यह राग अभोगी कान्हड़ा था जिसे शास्त्रीय गायक कृष्णेन्द्र वाडीकर ने चैनदारी के साथ प्रस्तुत किया।श्री शनैश्चर जयंती अखिल भारतीय संगीत समारोह में बुधवार को उन्होंने गायन प्रस्तुत किया। उनके गायन में इत्मीनान के साथ ही मींड और मुरकियों का बेहतरीन प्रयोग था और सप्तक में उनकी आवाजाही सहज थी। उनके बाद शहर के प्रतिभाशाली कलाकार कमल कामले ने वायलिन वादन किया।

मिश्र धुन और भैरवी की मिठास

शनि मंदिर में कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध गायक कृष्णेंद्र वाडीकर ने अभोगी कान्हड़ा में आलाप लेने के बाद विलंबित में बंदिश गाई जिसके बोल थे : चरण धर आए। इसके बाद उन्होंंने द्रुत में बंदिश गाई। फिर कन्नड़ भजन गाने के बाद एक अभंग प्रस्तुत कर गहरी भक्तिभाव धारा बहाई। तबले पर हितेंद्र दीक्षित और हारमोनियम पर उपकार गोडबोले ने संगत की। दूसरी सभा में कमल कामले ने वायलिन वादन किया। शुरुआत उन्होंने राग मालकौंस से की। विलंबित मध्य ताल और द्रुत तीन ताल में माधुर्यभरा वादन किया। इसके बाद स्वरचित मिश्र धुन प्रस्तुत की। राग भैरवी पर आधारित रचना से बजाकर समापन किया। तबले पर उल्हास राजहंस ने संगत की।

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