पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • National
  • सफाई में इंदौर नं. 1 लेकिन इसे हरे फेफड़ों की ज़रूरत

सफाई में इंदौर नं. 1 लेकिन इसे हरे फेफड़ों की ज़रूरत

3 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष, नई दिल्ली के डॉ. एम.के. रणजीतसिंह झाला ने कहा कि मैं बरसों बाद इंदौर आया हूं। इस शहर में स्वच्छता देखकर अभिभूत हूं। स्वच्छता में नंबर 1 आने पर बधाई देता हूं लेकिन घटती हरियाली देखकर मैं बहुत निराश हुआ। इस शहर को हरे फेफड़ों की ज़रूरत है। इंदौर के हरे इलाके धीरेे-धीरे खत्म हो रहे हैं। इंदौर के शहरवासियों को सिरपुर तालाब और रालामंडल के रूप में दो बहुमूल्य तोहफे मिले हैं। इन्हें बचाया जाना चाहिए। यह बात उन्होंने पर्यावरण और वन्य संरक्षण : चुनौतियां और संभावनाएं विषय पर व्याख्यान में जाल सभागृह में गुरुवार को कही। वे अभ्यासमंडल की 59वीं ग्रीष्मकालीन व्याख्यानमाला में बोल रहे थे।

राजनीतिक इच्छाशक्ति के बगैर पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण संभव नहीं

उन्होंने कहा कि आज पर्यावरण संरक्षण के नाम पर लक्ष्मण रेखा को लांघा जा रहा है। इसी का दुष्परिणाम है कि चीतल, सांभर और नील गाय बहुमूल्य फसलों को चौपट कर जाते हैं और तेंदुआ, बाघ और चीता बस्तियों में घुस आते हैं। हमें यह तय करना होगा कि विकास किस कीमत पर किया जाना चाहिए। विकास के लिए पर्यावरण और वन्यजीवों को बारी कीमत चुकाना पड़ रही है। यह बात समझ ली जाना चाहिए कि राजनीतिक इच्छाशक्ति के बगैर पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण नहीं किया जा सकता। बहुत कम लोग हैं जो गहरी चिंता के साथ पर्यावरण संरक्षण का काम कर रहे हैं लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया है। क्या यदि ताज़महल के नीचे हीरे मिलें और अजंता-एलोरा के नीचे तेल का खजाना मिले तो क्या हम हवां खुदाई करेंगे? इसी तरह हमेें यह सोचना है कि जंगल और टाइगर रिज़र्व और नेशनल पार्क भी हमारे नेचर के टेम्पल हैं। इन्हें प्रतिबद्धता के साथ बचाया जाना चाहिए।

ब्यूरोक्रेसी हावी रहती है, जानकारों को फैसलों में शामिल नहीं करते

उन्होंने कहा कि दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां हरियाली सबसे कम क्षेत्र में है। हमारे देश में पर्यावरण जैसे विषयों पर फैसला लेने में ब्यूरोक्रेसी पूरी तरह से हावी रहती है। पर्यावरण के जानकारों को फैसले में सहभागी नहीं बनाया जाता है। चीते सहित कुछ वन्य जीव हमने अपनी लापरवाही से खो दिए हैं क्योंकि हमने लक्ष्मण रेखा लांंघी है। वरिष्ठ पत्रकार अभिलाष खांडेकर ने भी संबोधित किया। अतिथि को प्रतीक चिन्ह झाबुआ नरेश ने भेंट किया। संचालन अशोक कोठारी ने किया। आभार प्रदर्शन गौतम कोठारी ने माना।

डॉ. एम.के. रणजीतसिंह झाला

रालामंडल पर शहर को गर्व करना चाहिए

उन्होंने कहा कि सिरपुर तालाब इस शहर के लिए बहुमूल्य वेटलैंड है। इसे भले ही सेंचुरी ना बनाया जा सके लेकिन इसे एक कंजर्वेशन रिज़र्व तो बनाया ही जा सकता है और इसको लेकर कोई पाबंदी भी नहीं है। इसी तरह रालामंडल भी बहुमूल्य तोहफा है। रालामंडल पर शहरवासियों को गर्व करना चाहिए। यह आपका अपना है। यहां पौधारोपण करिए और इसे संभालिए। किसी नॉलेजेबल व्यक्ति को इसकी देखरेख का जिम्मा सौंपा जाना चाहिए। कल्पवृक्ष और चौसिंघा इस इलाके की धरोहरें हैं। हम इनके बारे में जानते ही नहीं, ना ही जागरूक हैं।

उन्होंने कहा कि हम मेगा मैमल मायोपिया के शिकार हैं। जब हम किसी टाइगर रिज़र्व को देखने जाते हैं तो इसी बात से निराश हो जाते हैं कि टाइगर की लोकेशन नहीं मिल रही है, हम टाइगर देख ही नहीं पाए। आप टाइगर रिज़र्व से लौटते सैलानियों की बॉडी लैंग्वेज देखकर कह सकते हैं कि इन्हें टाइगर नहीं दिख पाया। यह सोचना निहायत ज़रूरी है कि टाइगर के अलावा भी जंगल में कितनी विपुल जैव विविधता और सुंदरता है, इसे हम नहीं देखते। जबकि इसके प्रति हमें ज्यादा जागरूक रहने की ज़रूरत है।

हम मेगा मैमल मायोपिया के शिकार हैं

खबरें और भी हैं...