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बच्चे कहानियां सुनते रहे और मिट्टी में उनके किरदार रचते रहे

3 वर्ष पहले
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राजा-रानी की, परियों की, शेर-चीतों की कहानियां जिनमें कल्पनाएं, रोमांच और जीवन के कई सबक भी हैं। ये बच्चे उन्हें सुनते जाते हैं और मिट्‌टी में उन कहानियों के किरदारों को रचते जाते हैं। शहर में हुई टेल्स विद क्ले वर्कशॉप में बच्चों ने मिट्टी के साथ कहानी के दृश्यों को, अपनी कल्पनाओं को रचा। आर्टिस्ट भारती दीक्षित उन्हें रोचक और शिक्षाप्रद कहानियां सुनाती रहीं और बच्चे माटी में उन्हें रचते रहे।

भारती ने कहा - आपाधापी भरी ज़िंदगी में कहानियों के माध्यम से ही नैतिक संस्कारों का बीजारोपण किया जा सकता है। पहले बच्चे दादी-नानी से कहानियां सुनते थे, लेकिन अब परिवार छोटे हो गए हैं। संयुक्त भी हैं तो बच्चों के पास इतना वक्त नहीं है। वो ओवरशेड्यूल्ड हैं। एक और पेंच यह है कि बच्चों को प्रीचिंग करेंगे तो वे ऊबने लगेंगे। इसलिए खेल-खेल में कुछ सार्थक, मर्मस्पर्शी कहानियां सुनाई उन्हें और क्ले दे दी। मकसद था कि बच्चे सिर्फ सुनें नहीं, बल्कि विश्लेषण भी करें और सृजन करें। इस तरह वे वैल्यूज़ भी सीखेंगे और ये कहानियां उनकी स्मृतियों बनी रहेंगी।

टेल्स विद क्ले वर्कशॉप में बच्चों ने दिखाई क्रिएटिविटी, राजा-रानी की कहानियां सुनकर उन्हें माटी में साकार किया

गांव की कहानी में बच्चों ने किसान की पोटली, उसमें रखे सिक्के, झोपड़ी बनाने से शुरुआत की। कहानी आगे बढ़ती रही और बच्चों की कृतियों में संवेदनाएं-कल्पना सजीव होने लगीं। जब उन्हें गरीब बालक रामू के संघर्ष की कहानी सुनाई गई तब अपनी मां के फटे कपड़ों को देखकर रामू एक साड़ी के लिए कड़ी मेहनत कर पैसे जुटाता है। यह सुनकर अधिकांश बच्चों ने अपनी मां के लिए मिट्टी से सलवार कमीज़ बना दिए।

मिट्टी के स्पर्श से कहानी के संदेश तक

भारती बताती हैं कि बच्चे अब वीडियो गेम खेलते हैं। मिट्‌टी से तो दूर ही हो गए हैं। मिट्टी का स्पर्श भी ज़रूरी है। बच्चों की कोमल भावनाओं जैसी ही है मिट्टी भी। इसीलिए यह प्रयोग किया गया। कहानी के जरिए पेड़ों को पानी देना, माता-पिता का आदर करना, झूठ नहीं बोलना और चोरी नहीं करना जैसे संदेश भी दिए।

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