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मैं तुझको लिखूं अक्षरों में कहीं, तू मुझे ढूंढ ले किसी किताब में

3 वर्ष पहले
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सिटी रिपोर्टर | इंदौर

ये युवाअों को अपनी प्रतिभा दिखाने का एक ऐसा मंच है जहां वे बिना किसी झिझक और अनौपचारिक ढंग से अपने दिल की बात को बेबाकी से बयां करते हैं। ओपन माइक के तहत एक हॉल में किए गए कार्यक्रम में 30 से ज्यादा युवा्ओं ने कविताएं सुनाई, गीत सुनाए और मिमिक्री के जरिए अपने हुनर का प्रदर्शन किया। इन कलाकारों ने अच्छी खासी संख्या में मौजूद श्रोताओं के सामने किसी ने गीत गाए तो किसी ने शिन चैन की मिमिक्रि की। किसी ओक्टापैड पर सुरीला गीत बजाया। ग्रुप के कलाकारों ने मिलकर \\\"चांदी की चम्मच\\\" नाम से शॉर्ट फिल्म बनाई है, जिसका टाइटल सॉन्ग \\\"बन्दिशें\\\" भी लॉन्च किया गया। कैप्टन जैसन थॉमस ने इस गीत को लॉन्च करने के साथ ही असफलता की महत्ता समझाई।

एक छोटी सी परी मेरे सपनों में आती है/ मुझे कहती है भैया दुनिया क्यों मुझपे ज़ुल्म ढाती है/

देव शर्मा ने कविता पढ़ी : तू मेरे ख्वाब में मैं तेरे ख्वाब में / काश ऐसा हो कि हम मिले ख्वाब में/ मैं तुझको लिखूं अक्षरों में कहीं/ तू मुझे ढूंढ ले किसी किताब में। प्रकृति सिंह ने अपने ख्वाहिशों को यूं शब्द दिए कि आसमान की गोद से छूट रहा है सूरज / देखो! कैसे इठलाता हुआ, मानो / चल पड़ेगा अभी ही/ उठेगा और खेलने लगेगा/ मुस्कुराता हुआ, बलखाता हुआ। आसमान की गोद से छूट रहा है सूरज/ देखो इतराता हुआ। उसके आने का जग में / कुछ ऐसा खुमार है/ चिड़ियों का कलरव है/ संगीतमय सारा संसार है, कोमल किरणों से अपनी / करता पृथ्वी का श्रृंगार है/ अलौकिकता से परिपूर्ण / आभामय संसार है। फिर ऋषभ चोलकर ने रचना सुनाई : एक छोटी सी परी मेरे सपनों में आती है/ मुझे कहती है भैया दुनिया क्यों मुझपे ज़ुल्म ढाती है/ क्यों मैं कभी दिल्ली कठुआ शिवपुरी उन्नाव हर जगह मारी जाती हूं, हर दो चार दिन में मैं अख़बार की सुर्खियां क्यों बन जाती हूं, फिर होता है कुछ दिन कैंडल मार्च और तमाशा/ फिर क्यों भूल जाते है लोग मैं रखती हूं आशा /क्यों मुझे हिंदू मुस्लिम का नाम दिया जाता है/ अस्मिता मेरी लुटती है और इसे राजनीतिक पैग़ाम दिया जाता है।

देव शर्मा

ऋषभ चोलकर

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