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घर में एक नहीं, कई मां होती है, इन्हें देखने की नज़र चाहिए

3 वर्ष पहले
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ख्यात चित्रकार डॉ. शुभा वैद्य का मानना है कि आजकल बच्चों को घर में एक ही मां दिखाई देती है जबकि पहले घर में दादी, ताई, काकी, भाभी जैसी कई मां होती थीं। इन्हें देखने की नज़र चाहिए। क्या आपको पता है कि मदर्स डे का प्रतीक एक फूल है बकुल जिसकी पंखुरियां कभी नहीं बिखरती। ठीक उसी तरह मां होती है जो कभी भी किसी भी परिस्थिति में नहीं बिखरती। मां की प्रकृति भी ऐसी ही होती है। मेरा बेटा असमय गया लेकिन वह मुझे मुस्कुराना सिखा गया।

मदर्स डे का कॉमर्शियल रूप बुरा लगता है, हमें अपने बच्चों को यही संदेश देना है कि वह अपने में घर में कई मां को देख सकता है। यह बात उन्होंने वामा साहित्य मंच के कार्यक्रम में कही। एक होटल में मेरे पास मां है कार्यक्रम किया जिसमें सदस्याओं ने अपनी स्वरचित कविताओं में मां को नए ढंग से परिभाषित किया।

वो उबार लेती है, मुश्किलों में सबको संभाल लेती है

डॉ. शुभा वैद्य

सदस्यों ने मां पर स्वरचित चार-चार पंक्तियां प्रस्तुत कीं। इसके साथ ही कुछ सदस्याएं खूबसूरत पोस्टर बना कर लाई। कुमुद मारू पोस्टर बनाकर लाई और लिखा- मां मैं तेरे ख्यालों से निकलूं तो कहां जाऊं, तू मेरी सोच के हर रास्ते पर नज़र आती है। निधि जैन ने रचना सुनाई- वो तो मां है न, वो उबार लेती है, मुश्किलों में सबको संभाल लेती है, गणित जिंदगी का या रिश्तों में नमक, जरा कम पड़े खुद को डाल देती है। स्मृति आदित्य रचना पढ़ी : उसकी केशर सुगंध मेरे रोम-रोम से प्रस्फुटित होती है, मेरी सांस-सांस की हर महक उसकी आत्मा से उठती है, वह देहरी पर सजी रंगोली सा इंद्रधनुषी प्यार है, मां, जिसकी बिंदी में समाया मेरा संपूर्ण श्रृंगार है। जबकि उर्मिला मेहता ने उर्मिला मेहता ने मां पर पंक्तियां रचीं कि - मां तुम्हारा ऋण है निश्चल, कहो कैसे मैं चुकाऊं, मित्र जैसी पालना को याद कर आंसू बहाऊं,बन गई हूं दादी,नानी, मन तो बच्चा ही रहा, मायके का अर्थ भी अब मर्म को छुने लगा। निरूपमा नागर की रची पंक्तियां थीं- मां, शुक्ल पक्ष की चांदनी तुम हमें देती रहीं, स्वयं कृष्ण पक्ष की चांदनी सी ढलती रही, चांदनी का यूं ढलते जाना क्यूं हम गवारा करें, अमावस्या की रात, जीवन में तुम्हारे कभी पग न धरे और अंजू निगम ने कविता के जरिए प्रश्न रखा कि - मां की भी कोई जात है, क्या वे हिंदू-मुसलमान है, मां तो बस मां है, उनके आशीष के बिना हमारी भी कहां पहचान है। इसके अलावा ज्योति जैन, पद्मा राजेंद्र, रंजना फतेहपुरकर, मधु टांक, वंदना वर्मा, विद्या पाराशर, शारदा गुप्ता और अंजू निगम ने भी कविता पाठ किया।

शारदा गुप्ता

निधी जैन

उनके आशीष के बिना हमारी भी कहां पहचान है

वंदना वर्मा ने लिखा मां को छाया बताते हुए रचना पढ़ी कि मुश्किल है कुछ शब्दों में बयां करना मां को, दुनिया की तपती दोपहर में अपने आंचल की छाया देती है मां। डॉ. शोभा ओम प्रजापति ने मां को ईश्वर की रचना निरूपित करते हुए कहा कि ईश्वर की रचना के हम सब, पर मैं तेरा आधार हूं मां, बोध हुआ जब मुझे ज्ञान का, तुम मेरी प्रथम गुरु कहलाई मां, नहीं कोई दूजा मेरी नज़र में, गीता सा ज्ञान कराती मां, होऊं नहीं कृतघ्न कभी भी, मैं तुझ सी बन जाऊं मां। विद्या पाराशर ने लिखा कि एक विक्षिप्त सी मां, कुछ माह की बच्ची को गोद में समेटे, स्तनपान करा रही थी, नजरे चपल सी चारों ओर घुमा रही थी, बार-बार सिर घुमा कर मुस्कुरा रही थी, मानो कह रही हो, तुम मेरा क्या बिगाड़ सकते हो, मेरे पास मां है।

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