पुलिस ने महेश बैरागी की गिरफ्तारी के बाद 9 से 13 दिसंबर तक की सभी कार्रवाई में लोकेंद्र सिंह और सत्यनारायण सलवाड़िया को स्वतंत्र गवाह बताया। टीआई राजेंद्र सोनी ने बताया दोनों गवाह उन्हें तीन इमली चौराहे पर मिले थे। उन्हें मदद के लिए बोला तो वे तैयार हो गए। कोर्ट ने साबित किया दोनों गवाह स्वतंत्र थे ही नहीं। लोकेंद्र सिंह न सिर्फ कविता का पड़ोसी है बल्कि तीन इमली चौराहे के पास जहां कविता की लाश मिली, उसी के सामने गीतांजलि नाम से उसकी वर्कशॉप है। पुलिस ने पहले उसे संदेही मानकर हिरासत में लिया था। सत्यनारायण का पोल्ट्री फॉर्म है। जिस बोरे में लाश मिली थी वह मुर्गी दाने का बोरा था। इसके आधार पर सत्यनारायण भी संदेहियों की सूची में था। ऐसे में यह सबसे बड़ा झूठ निकला।
चौथा : 80 अधिकारियों की फौज थी, फिर भी पुलिस सजा क्यों नहीं दिलवा सकी? जवाब : कोर्ट में पुलिस के सिर्फ तीन किरदार, वो भी आपस में उलझते रहे
हत्याकांड में 108 दिन की जांच में 80 अधिकारियों की फौज जुटी। जबकि कोर्ट के फैसले में सिर्फ तीन किरदार नजर आए।
जवाब : दो खास गवाह, जिन्होंने आरोपी को पहचाना, वे खुद संदेही।
दीपेश शर्मा | इंदौर. कविता रैना हत्याकांड के फैसले से पूरा शहर स्तब्ध है कि आखिर इतनी बड़ी पुलिस टीम की जांच फेल कैसे हो गई? पुलिस सिर्फ महेश बैरागी द्वारा फुटेज लेने आना और किराए से दुकान लेना व बंद कर देना, यही दो बिंदु प्रमाणित कर सकी। पार्किंग वाले ने पहचाना, कॉल डिटेल निकली, 41 गवाह थे, यह सभी झूठे कैसे हो गए। भास्कर ने कोर्ट के फैसले से चार मुख्य सवालों के जवाब ढूंढे।
दूसरा : पार्किंग वाले ने आरोपी को पहचाना तो सजा क्यों नहीं?
पुलिस महेश को 12 दिसंबर 2015 को नौलखा बस स्टैंड की पार्किंग पर ले गई थी। वहां पार्किंग संचालक शैलेंद्र आमोदिया भी था, जिसने सबसे पहले महेश द्वारा 24 अगस्त को गाड़ी खड़ी करने का दावा किया था। पुलिस का कहना था वह महेश को स्टैंड पर मुंह ढांककर ले गई थी ताकि उसका चेहरा शैलेंद्र को तब नहीं दिखाई दे। कोर्ट ने साबित किया कि पुलिस के पंचनामे में चेहरा ढांके जाने का कोई उल्लेख था ही नहीं। शैलेंद्र से महेश की पहचान पुलिस ने चार महीने बाद 2 मार्च 2016 को करवाई। इससे कोर्ट ने यह मान लिया कि शैलेंद्र ने महेश को 12 दिसंबर को देखने के बाद भी पहचाना नहीं था। अगर पहचाना होता तो पुलिस उसी दिन शैलेंद्र से महेश की शिनाख्त करवा लेती।
1. विवेचना अधिकारी टीआई राजेंद्र सोनी : इन्हें 12 बार कोर्ट ने झूठा साबित किया। यह टीआई वही जानकारी दे सके जो उन्हें पता थी, क्राइम ब्रांच की कार्रवाई या कनाड़िया पुलिस की कार्रवाई पर हुए सवाल के जवाब इनके पास थे ही नहीं तो यह बचने वाले उत्तर देते रहे, ऐसा कोर्ट ने फैसले में उल्लेख किया।
2. क्राइम ब्रांच की एसआई श्रद्धा यादव : क्राइम ब्रांच की एसआई श्रद्धा यादव द्वारा केस की टेक्निकल एनालिसिस रिपोर्ट पेश की गई। इस रिपोर्ट पर भी तारीख नहीं थी। इस पर कोर्ट ने आपत्ति ली और कॉल डिटेल सहित सिर्फ 3 दिन की टॉवर लोकेशन पेश करने पर नाराजगी जाहिर की।
3. एफएसएल एक्सपर्ट डॉ. सुधीर शर्मा : इन्हें भी कोर्ट में गलत जानकारी देने पर कई बार टोका। जैसे चाकू जब्त नहीं करना, अधूरे टेस्ट करना, फ्लैट पर खून के सैंपल लेते समय गफलत, फ्लैट पर पहुंचने के समय में गफलत, पहली डीएनए रिपोर्ट फेल होने पर दूसरी बार सेंपल भेज रिपोर्ट पॉजिटिव बुलवाना।
जवाब : चार महीने बाद करवाई पहचान को सही नहीं माना।
तीसरा : आरोपी की शिनाख्ती कार्रवाई को कोर्ट ने क्यों नहीं माना?
नृशंस हत्या जैसे मामले को पुलिस ने कितने हलके में लिया यह कोर्ट ने प्रमाणित किया। साईंकृपा इलेक्ट्रिकल्स पर मुकेश चौहान व संजीव विश्वकर्मा से महेश ने सीसीटीवी फुटेज की मांग की थी। मुकेश और संजीव से महेश की शिनाख्ती की कार्रवाई भंवरकुआं पुलिस ने 27 फरवरी 2016 को तहसीलदार राजकुमार हलदर से करवाई थी। इन्हीं तहसीलदार ने 2 मार्च को शैलेंद्र अामोदिया द्वारा महेश को पहचानने की कार्रवाई भी संचालित की। जबकि कोर्ट ने यह साबित किया कि शिनाख्ती के लिए तहसीलदार अधिकृत व्यक्ति ही नहीं थे। उन्हें कलेक्टर द्वारा नजूल व राजस्व संबंधी कार्य का अधिकार दिया गया है। शिनाख्ती का अधिकारी कोर्ट का है। यह बात टीआई और तहसीलदार ने भी मानी कि उन्हें ऐसा करवाना नहीं चाहिए था।
जवाब : नजूल देखने वाले तहसीलदार से ही करवा दी शिनाख्ती