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जमीन नहीं मिलने से अटक गए प्लास्टिक इंजीनियरिंग के कोर्स

3 वर्ष पहले
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इंदौर डीबी स्टार

सिपेट यानी सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी की लगातार पूछपरख हो रही है। सिपेट में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का सौ फीसदी प्लेसमेंट होता है। यही वजह है कि विद्यार्थियों में इंजीनयिरिंग की अन्य डिग्रियों के अलावा इसमें रुचि ज्यादा है। सिपेट को राजधानी में जमीन नहीं मिलने से उसका विस्तार अटक गया है। यही वजह है कि बीटेक और एमटेक जैसे कोर्स शुरू नहीं हुए तो यह डिग्री लेने के लिए विद्यार्थियों को बाहर जाना पड़ रहा है। भोपाल के अलावा अहमदाबाद, भुवनेश्वर, चेन्नई, बैंगलुरु, लखनऊ और कोच्चि में ही इस विषय के दरवाजे खुलते हैं।

मुख्यमंत्री ने चिट्ठी लिखी

सिपेट ने अपने विस्तार के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है। उसकी मांग है कि 10-12 एकड़ जमीन दे दी जाए। बताते हैं कि चार साल पहले सेमरा में जमीन मिली, लेकिन स्थानीय लोगों ने विरोध कर दिया। यह मामला मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के सामने रखा गया तो उन्होंने राजस्व विभाग को आदेश दिए कि सिपेट के लिए जमीन तलाशी जाए।सिपेट प्रबंधन और राजस्व विभाग की टीम ने रचना नगर टॉवर के सामने वाली जमीन के बारे में मुख्यमंत्री से बात की। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय उद्योग मंत्री अनंत गीते को पत्र लिखा और मांग की कि सिपेट के लिए भेल से यह जमीन दिलाई जाए। आलम यह है कि केंद्रीय मंत्री की ओर से अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। वर्तमान में लांग टर्म कोर्स में 693 और शॉर्ट टर्म कोर्स में 500 विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं। इनके लिए हॉस्टल तक नहीं है। किराए पर मकान लेकर छात्रावास की व्यवस्था की गई है। यह कोर्स करने वाले विद्यार्थियों का कहना है कि प्रबंधन ने 150 और 350 सीटर छात्रावास की व्यवस्था की है, लेकिन अन्य छात्रों को किराए के मकान लेकर रहना पड़ रहा है।

जमीन मिलेगी तो शुरू होंगे नए कोर्स

सिपेट के निदेशक डॉ संदेशकुमार जैन के अनुसार प्लास्टिक इंजीनियरिंग में बच्चों का बेहतर भविष्य है। यही वजह है कि इस विषय की मांग बढ़ती जा रही है। हम चार साल से जमीन की मांग कर रहे हैं। रचना नगर के पास जमीन तलाशी गई थी। उसे लेकर पत्र व्यवहार भी हुआ लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। यदि जमीन मिल जाती है तो नए कोर्सेस शुरू करने की कवायद होगी। जमीन मिलने के बाद उसकी डीपीआर बनाएंगे। इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर अन्य निर्माण कार्य राज्य सरकार को करना है। प्रशासनिक कार्य केन्द्र सरकार करेगी। केन्द्र और राज्य को इसमें 50-50 प्रतिशत राशि खर्च करना है। उन्होंने बताया कि देश के 7 प्लास्टिक पार्क में से एक भोपाल के तामोट में बनाया जा रहा है। यदि विद्यार्थी सिपेट से डिप्लोमा कर लेता है तो उसे आसानी से नौकरी मिल सकती है।

इंदौर डीबी स्टार

सिपेट यानी सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी की लगातार पूछपरख हो रही है। सिपेट में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का सौ फीसदी प्लेसमेंट होता है। यही वजह है कि विद्यार्थियों में इंजीनयिरिंग की अन्य डिग्रियों के अलावा इसमें रुचि ज्यादा है। सिपेट को राजधानी में जमीन नहीं मिलने से उसका विस्तार अटक गया है। यही वजह है कि बीटेक और एमटेक जैसे कोर्स शुरू नहीं हुए तो यह डिग्री लेने के लिए विद्यार्थियों को बाहर जाना पड़ रहा है। भोपाल के अलावा अहमदाबाद, भुवनेश्वर, चेन्नई, बैंगलुरु, लखनऊ और कोच्चि में ही इस विषय के दरवाजे खुलते हैं।

मुख्यमंत्री ने चिट्ठी लिखी

सिपेट ने अपने विस्तार के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है। उसकी मांग है कि 10-12 एकड़ जमीन दे दी जाए। बताते हैं कि चार साल पहले सेमरा में जमीन मिली, लेकिन स्थानीय लोगों ने विरोध कर दिया। यह मामला मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के सामने रखा गया तो उन्होंने राजस्व विभाग को आदेश दिए कि सिपेट के लिए जमीन तलाशी जाए।सिपेट प्रबंधन और राजस्व विभाग की टीम ने रचना नगर टॉवर के सामने वाली जमीन के बारे में मुख्यमंत्री से बात की। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय उद्योग मंत्री अनंत गीते को पत्र लिखा और मांग की कि सिपेट के लिए भेल से यह जमीन दिलाई जाए। आलम यह है कि केंद्रीय मंत्री की ओर से अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। वर्तमान में लांग टर्म कोर्स में 693 और शॉर्ट टर्म कोर्स में 500 विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं। इनके लिए हॉस्टल तक नहीं है। किराए पर मकान लेकर छात्रावास की व्यवस्था की गई है। यह कोर्स करने वाले विद्यार्थियों का कहना है कि प्रबंधन ने 150 और 350 सीटर छात्रावास की व्यवस्था की है, लेकिन अन्य छात्रों को किराए के मकान लेकर रहना पड़ रहा है।

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