इंदौर के नए-पुराने लोगों को मुबारकबाद। बगैर लोगों के यह जीत नहीं मिलती। उन्होंने खुद को बदलते हुए शहर को बदला। जब आप सर्वश्रेष्ठ घोषित किए जाते हैं तो अंगुलियां भी उठती हैं। आवाजें उठेंगी कि सफाई में नंबर शहर का ट्रैफिक तो देखिए। हर मोर्चे पर आंके जाएंगे हम। नई लीक पर चलना पुरानी रवायत है इस शहर की। 1942 में भी इंदौर ने एक पहल की थी। तब इंदौर एकमात्र ऐसी स्टेट थी जहां नलों में फिल्टर्ड पानी आता था। गंभीर तालाब के पास फिल्टर प्लांट हुआ करता था। शहर की कच्ची सड़कों पर पानी का छिड़काव करने हर शाम गाड़ी आती थी। इंदौर कई शहरों की प्रेरणा बन गया है। मेरी भी बना। मुंबई में बैंड स्टैंड पर रहते हैं हम। वहां इतना कचरा हो जाता था कि किनारे के पत्थर तक नज़र नहीं आते थे। मैंने रैगपिकर्स को बुलाकर कहा कि प्लास्टिक और बोतलों के साथ एक थैली में कचरा भी उठाएं। मेहनताना मैं दूंगा। अब आप आकर देखें, बैंड स्टैंड क्लीन हो गया है। इंदौर को प्रयास जारी रखना हैं और एक दिन नहीं, हर रोज कोशिश करना है। शेष|पेज 10 पर
इसे ताउम्र बरकरार रखना है। साथ ही यह भी देखना है कि हमारे बाद यह जिम्मेदारी कौन लेगा। शायद इस तरह इंदौर में एक बार फिर नज़र आने लगें चींटियों को आटा डालने वाले, सड़कों पर राहगीरों को पानी पिलाने वाले, मुस्कराहटें बांटने वाले लोग। नंबर वन होने के बाद अब इंदौर को तीन कहावतों को अमल में लाना चाहिए। पहले उस चीनी कहावत पर जो कहती है, “टू बिकम ए सेंट, क्योर पीपल, फीड पीपल।’ मतलब अगर आप संत बनना चाहते हैं तो लोगों का इलाज कीजिए, उनका पेट भरिए। दूसरी, जब आपका कद बढ़ना बंद हो जाए तो हर इंसान दरख़्त लगाए।। इंदौर के वो लोग जिन्होंने शहर को सफाई में अव्वल बनाया, वे अब इसे हराभरा भविष्य दें और तीसरी, लव ईच अदर ऑर पेरिश यानी इंसान-इंसान से प्रेम करे या फ़ना हो जाए। ’
-जैसा उन्होंने अंकिता जोशी को बताया