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घरों से ही गीला-सूखा कचरा अलग-अलग करते, कार में रखते डस्टबिन, रात में भी सफाई, इसलिए हम फिर अव्वल

3 वर्ष पहले
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गंदगी और कचरे के ढेर पर पार्षदों के बैठने तक की घटनाएं इंदौर ने 2014 तक देखी। इंदौर नगर निगम में एटूजेड कंपनी के काम से खुद निगम परेशान था। इस बीच निगम चुनाव हुए और फरवरी 2015 में बतौर महापौर मालिनी गौड़ ने भाजपा की परिषद में 65 भाजपा पार्षदों के साथ कमान संभाली। महापौर मालिनी गौड़ बतौर प्रत्याशी जब चुनी गईं तो दैनिक भास्कर ने ही शहर की सफाई को मुद्दा बनाया और शहर के लिए यह वादा लिया कि वे मेयर बनीं तो इंदौर को स्वच्छ शहर बनाएंगी। इसमें सबसे पहले एक ऐसी सड़क बनाकर देंगी, जिस पर बैठकर खाना खाया जा सके। शुरुआत हुई कचरा उठाने वाली कंपनी एटूजेड को हटाने से। 2015 में यह काम हो गया था। 2016 में निगम ने सफाई को मिशन के रूप में लिया। डेढ़ हजार से ज्यादा नाकारा कर्मचारियों को निकाला तो नई भर्ती की और सफाई के नए संसाधन भी जुटाए। बदलाव आया डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन शुरू करने के बाद कचरा पेटियां पूरी तरह शहर से हटाने से। परिणाम यह रहा कि 2017 के सर्वेक्षण में इंदौर नंबर-1 घोषित हुआ। बात यहीं खत्म नहीं हुई, अवाॅर्ड मिला तो कचरे को अलग-अलग करने पर फोकस हुआ। गीले और सूखे कचरे को अलग करने के साथ सेनेटरी वेस्ट का तीसरा डस्टबिन भी इंदौर शहर ने ही लगाया। इसके बाद कचरे से खाद बनाने काम शुरू हुआ और शहर भर में कम्पोस्ट प्लांट लग गए। इंदौर में सर्वेक्षण के लिए जब टीम आई तो भास्कर ने ही बताया शहर में क्या खास हुआ सफाई में। परिणाम यह रहा कि इंदौर दोबारा नंबर-1 बना।

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30 हजार कम हो गए बीमारियों के केस

सफाई बढ़ने से हमारी सेहत भी तंदुरुस्त हुई है। आंकड़ों की मानें तो वर्ष 2017 में कालरा जैसी बीमारी शहर में रजिस्टर्ड ही नहीं हुई। वहीं डेंगू, डायरिया और मलेरिया के मरीज भी कम मिले। नंबर 1 के बाद शहर में धूल-मिट्टी तो कम हुई ही, बीमारियां भी घटी हैं। 2016 में कालरा के 16 मामले आए थे सामने। जबकि पिछले साल एक भी ऐसा केस सामने नहीं आया था। वायरल बीमारियों में कमी आई।

दो असर

14 प्रतिशत की गिरावट रही प्रदूषण में

सफाई के कारण इंदौर में डेढ़ साल में पर्यावरण में सुधार आया है। 2016 की अपेक्षा 2017 में प्रदूषण में 14 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है। यह खुलासा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट से हुआ। पीएम-10 (10 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर माप के वे धूल कण जो सांस लेते वक्त शरीर में प्रवेश करते हैं) कम हुए हैं। इनका मानक स्तर 60 है। 2016 में यह 92 थे और अप्रैल 2018 में 80 दर्ज हुए। पीएम 2.5 का स्तर 2016 में 51 था। 2018 में यह मानक के लगभग बराबर 43 दर्ज हुआ है।

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