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विकारों की मलिनता के कारण प्रभु नहीं दिखते

3 वर्ष पहले
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भक्ति मार्ग पर स्वाध्याय अति आवश्यक है। हमारे जीवन का एकमात्र ध्येय परमात्मा है। प्रभु का निवास हमारे ही अंतकरण में है। लेकिन विषय विकारों की मलिनता के कारण वह उजागर नहीं हो पाता। वह प्रभु तत्व एक अखंड ज्योति के रुप में हर ओर विद्यमान है। लेकिन एक साथ साधक ही उस तक पहुंच सकता है। यह कहना है साध्वी सवता भारती का। वह दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की अोर से आयोजित साप्ताहिक सत्संग में प्रवचन कर रही थी।

हनुमान गेट आश्रम में आयोजित सत्संग में साध्वी सविता भारती ने मानव कल्याण का एकमात्र साधन ब्रह्मज्ञान बताया। उन्होंने कहा कि एक साधक जो हर समय स्वाध्याय व निष्ठा के साथ भक्ति मार्ग पर चलता है। वह ही उस परम तत्व यानि प्रभु का अनुभव स्वयं के भीतर कर सकता है। हमें जब परमात्मा का अनुभव अपने भीतर होता है, तो अनायास ही हम उस परम पिता का अनुभव करने लगते हैं। लेकिन आंखें बंद करने मात्र से ही स्वाध्याय नहीं होता। करतापन का भाव त्याग कर मैं से तू का सफर तय करना ही स्वाध्याय होता है। लेकिन ये भावों की उच्चावस्था हमें तभी प्राप्त हो सकती हैं। जब हम गुरू कृपा के पात्र बनेंगे। सदगुरू की कृपा सदैव हम सब पर एक समान ही बरसती है। लेकिन ये हम पर निर्भर है कि हम उसे कितना संभाल पाते हैं। हमें हर समय अपने विचारों को देखना होगा, तभी जीवन को सही दिशा मिल सकेगी।

यमुनानगर | दिव्या ज्योति जागृति संस्थान हनुमान गेट आश्रम में साप्तहिक सत्संग में प्रवचन करतीं साध्वी सुश्री सविता भारती व सत्संग में उपस्थित सत्संग।

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