मेडिकल कॉलेजों में स्वशासी समिति से संविदा डॉक्टरों की नियमित सीधी भर्ती खटाई में पड़ सकती है। स्वास्थ्य सचिव निहारिका बारीक ने डीएमई डॉ. एके चंद्राकर से कहा कि संविदा की भर्ती में कहीं, नियमित डॉक्टरों के प्रमोशन में अहित न हो जाए। इस पर डीएमई ने कहा कि नियमित डॉक्टरों का अहित नहीं होने दिया जाएगा। सचिव ने डीएमई से खाली पदों की जानकारी मांगी, लेकिन वे दे नहीं पाए। कहा कि शाम तक खाली पदों की जानकारी भेज दी जाएगी।
प्रदेश के छह सरकारी मेडिकल कॉलेजों में मध्यप्रदेश की तर्ज पर स्वशासी समिति से संविदा डॉक्टरों की नियमित भर्ती का प्रस्ताव तैयार किया गया है। चिकित्सा शिक्षा विभाग के भेजे प्रस्ताव पर शुक्रवार को स्वास्थ्य सचिव बारीक ने डीएमई व सभी मेडिकल कॉलेज के डीन के साथ मंथन किया। बैठक में नेहरू मेडिकल कॉलेज रायपुर व सिम्स बिलासपुर के डीन ने नई भर्ती का यह कहते हुए विरोध किया कि इससे नियमित डॉक्टरों का प्रमोशन प्रभावित हो सकता है। अगर भर्ती करनी है तो केवल असिस्टेंट प्रोफेसरों की भर्ती की जाए। प्रमोशन के पदों यानी एसोसिएट व प्रोफेसर के पदों पर भर्ती करना उचित नहीं है। बाकी कॉलेजों ने डीन ने प्रस्ताव पर मौन सहमति जताई। अंबिकापुर, रायगढ़, राजनांदगांव व जगदलपुर में डॉक्टरों की भारी कमी है। यही कारण है कि यहां के डीन संविदा डॉक्टरों की सीधी भर्ती के पक्ष में है। ताकि डॉक्टरों की कमी दूर हो और कॉलेज की मान्यता बचाने में आसानी हो। सिम्स में भी डॉक्टरों की कमी है, लेकिन वहां के डीन चाहते हैं कि डॉक्टरों की भर्ती स्वशासी के बजाय पीएससी से हो। नेहरू मेडिकल कॉलेज के नियमित डॉक्टर भी यही चाहते हैं। उन्होंने टीचर मेडिकल एसोसिएशन के माध्यम से पहले ही मुख्य सचिव, स्वास्थ्य सचिव व डीएमई को ज्ञापन सौंपकर स्वशासी समिति से होने वाली भर्ती का विरोध किया है।
बैठक में स्वास्थ्य सचिव ने मांगी खाली पदों की जानकारी मांगी
दूसरे राज्यों से डॉक्टर लाने का फार्मूला हो चुका है फेल
राजनांदगांव, जगदलपुर व अंबिकापुर मेडिकल कॉलेजों के लिए दूसरे राज्यों से डॉक्टर लाने का प्रयास फेल हो चुका है। डीएमई कार्यालय व मेडिकल कॉलेज के अधिकारी नागपुर, बेंगलुरू, भुवनेश्वर व दूसरे शहर जाकर वॉक इन इंटरव्यू कर चुके हैं, लेकिन वहां से कोई भी डॉक्टर लाने में कामयाब नहीं हो पाए। राजनांदगांव में जरूर 12 से ज्यादा डॉक्टर हैं, जो नागपुर के रहने वाले हैं। वेतन कम होने के कारण डॉक्टर यहां ज्वाइन नहीं करना चाहते। हाल ही में अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज को मुश्किल से मान्यता मिली है। पिछले साल मान्यता नहीं मिलने से 100 सीटों का नुकसान हुआ था।