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रेरा से बचने की जुगत, निगम को प्रोजेक्ट सौंपने की तैयारी कर रहे हैं कॉलोनाइजर

3 वर्ष पहले
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रियल इस्टेट रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट एक्ट (रेरा) के लागू होने के बाद से बिल्डर्स और कॉलोनाइजर्स अपने प्रोजेक्ट को किसी तरह निगम को हस्तांतरित करने के जुगाड़ में लगे हैं। इसके लिए पार्षद से लेकर नेताओं और अफसरों तक को ऑफर दिया जा रहा है।

इस बीच बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे इन कॉलोनियों में घर लेने वाले अपनी समस्याओं के हल होने का रास्ता मिलने से खुश नजर आ रहे हैं। शहर की कॉलोनी चाहे वह निगम के अाधिपत्य में हो या न हो लेकिन इन कॉलोनियों में जल्दी ही बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध होना तय माना जा रहा है। पेंच सिर्फ इतना है कि यदि निगम को ये प्रोजेक्ट हस्तांतरित हो जाते हैं तो इनमें निगम ही बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराएगा, जबकि हस्तांतरित न होने की स्थिति में ये जिम्मेदारी संबंधित कॉलोनाइजर की होगी।

रेरा एक्ट के तहत भू संपदा नियामक प्राधिकरण में उन सभी कॉलोनाइजर्स को पंजीयन कराना जरूरी है जिनके प्रोजेक्ट वर्तमान में चल रहे हैं या नए बनने वाले हैं। इसके लिए 31 मई की समय सीमा तय की गई है। निगम के ईई एसबी शर्मा के मुताबिक उन्होंने रेरा एक्ट के तहत पंजीयन कराने का आदेश सभी कॉलोनाइजर्स और बिल्डर्स को दे दिया है और इसकी पावती भी ले ली है। उन्होंने यह भी बताया कि कितनी कॉलोनी निगम को हस्तांतरित की गई हैं, इसकी जानकारी निगम में है ही नहीं।

19 करोड़ वसूलना था: बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध न कराने की जांच करते हुए 2012 में गठित जांच दल ने 16 कॉलोनियों से 19 करोड़ रूपए से ज्यादा की रकम वसूलने का निर्देश दिया था। इस बीच पांच साल और गुजर गए लेकिन किसी भी कॉलोनाइजर ने न तो बिजली, पेयजल, सड़क, पीसीसी नाली का निर्माण, आरसीसी नाली का निर्माण पुलिया, उद्यान विकास जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई।

भू संपदा (विनियमन एवं विकास) नियम 2017 (रेरा) में ग्राहकों को मिलेगी यह सुविधा

आवासीय प्रोजेक्ट से संबंधित सभी जरुरी जानकारी मिल सकेगी, पहले मकान लेने वाला उतना ही जान पाता था जितना बिल्डर बताता था उपभोक्ता फोरम या सिविल कोर्ट की जगह रेरा एक्ट में प्रशासनिक स्तर पर निपटारा होगा। प्राधिकरण द्वारा विवादों को निपटारा 60 दिन की समय सीमा में किया जाएगा। ग्राहकों से ली जाने वाली रकम में से 30 प्रतिशत ही बिल्डर उपयोग कर सकता है। शेष 70 फीसदी रकम बैंक में जमा रखेगा और इसका उपयोग सिर्फ संबंधित प्रोजेक्ट के निर्माण में होगा, पहले बिल्डर इस रकम काे अपने दूसरे प्राेजेक्ट में लगा देता था 500 वर्ग मीटर या 8 अपार्टमेंट से ऊपर के सभी प्रोजेक्ट रीयल इस्टेट नियामक प्राधिकरण में पंजीकृत कराना जरुरी है। निर्माण पूरी करने की समय सीमा भी तय होगी।

बंधक भूमि भी बेच दी, सुविधाएं भी नहीं

प्रशासन द्वारा जांच में यह खुलासा हुआ कि कॉलोनाइजर्स ने बुनियादी सुविधाएं तो नहीं दी, साथ ही बंधक रखे भूखंड को भी बेच दिया है। प्रशासनिक अफसरों ने उस समय ऐसे कॉलोनाइजर्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की बात कही लेकिन निगम से ही कई फाइलें गायब हो चुकी हैं। कुछ कॉलोनाइजर टाउन प्लानिंग के उप संचालक के यहां तो कुछ ने एसडीएम को अपनी कॉलोनी विकसित करने के बाद हस्तांतरित करने की जानकारी दे रहे हैं। वहीं ज्यादातर बिल्डर इस जुगाड़ में लगे हैं कि उनकी कॉलोनी किसी तरह निगम अपने अाधिपत्य में ले ले।

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