महेश धुर नक्सल प्रभावित सुकमा जिले के छोटे से गांव का रहने वाला है। आज से दो साल पहले तक हथियारबंद नक्सली उसके गांव में आते थे और बंदूकों के दम पर गांव में पनाह और भोजन की व्यवस्था करवाते थे। इतना ही नहीं कई बार पुलिस मुखबिरी के शक में निर्दोष लोगों को मौत के घाट भी उतार देते थे। गांव में महेश और उसके जैसे अन्य युवा इनका विरोध करना चाहते थे पर बंदूकों के सामने सब चुप हो जाते थे लेकिन साल भर पहले महेश जैसे सैकड़ों बस्तरिया युवक-युवतियों को नक्सलियों के खिलाफ आवाज उठाने का मौका मिला और अब सैकड़ों युवा आदिवासी नक्सलियों से लोहा लेने को तैयार हैं। ये सब संभव हुआ बस्तरिया बटालियन के बनने से जिसे सीआरपीएफ ने गठित किया है और इसमें सारे युवा बस्तर क्षेत्र के हैं।
बेहद खतरनाक साबित होंगे: बस्तर के नक्सल मोर्चे में अब तक सबसे ज्यादा नुकसान सीआरपीएफ ने ही उठाया है। कई बार ऐसे मौके आए हैं जब भौगोलिक परिस्थितियों और बोली भाषा के अभाव में एक साथ कई जवान शहीद हुए हैं। बस्तर में नक्सल मोर्चे पर लड़ने के लिए स्थानीय युवा काफी सक्षम हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण जिला पुलिस बल की डीअारजी की टीम है। डीआरजी में सभी स्थानीय युवकों को जगह दी गई है जो नक्सलियों को जंगल-सड़क हर जगह मात दे रहे हैं।
ये थी सोच: बोली, भाषा, ज्ञान का लाभ मिलेगा
दरअसल सीआरपीएफ ने 2016 में बस्तर में एक विशेष भर्ती अभियान चलाया था। इस अभियान का उद्देश्य नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में स्थानीय युवाओं की सहभागिता सुनिश्चित करना था। अभी सीआरपीएफ में ज्यादातर जवान बस्तर और छत्तीसगढ़ के बाहर से हैं। ऐसे में स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों, बोली-भाषा का ज्ञान जवानों को नहीं है और इसके अभाव में वे नक्सलियों का निशाना आसानी से बन रहे थे। ऐसे में स्थानीय युवक-युवतियों को सीआरपीएफ ने फोर्स के साथ जोड़ने के लिए बस्तरिया बटालियन का ही गठन कर लिया और धुर नक्सल प्रभावित इलाकों के युवक-युवतियों की सीआरपीएफ में भर्ती कर इन्हें गुरिल्ला युद्ध की कड़ी ट्रेनिंग दी।
743 जवान, 189 बालाएं भी, बटालियन नंबर 241
बस्तरिया बटालियन की पूरी नफरी (संख्या) 743 जवानों की है लेकिन अभी इसमें 739 जवानों की तैनाती हो पाई है। इनमें 189 बस्तरिया बालाएं और 534 युवक शामिल हैं। इनकी बटालियन का नाम बस्तरिया रखा गया है और बटालियन संख्या 241 है। इस बटालियन में बीजापुर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, सुकमा जैसे नक्सल प्रभावित इलाकों के युवा शामिल हैं। इन्हें 44 सप्ताह तक एटीसी बिलासपुर और एटीसी अम्बिकापुर में विशेष प्रशिक्षण दिया गया है।
जिन्होंने नक्सलवाद को करीब से देखा और अपनों को खोया, अब वे ही नक्सलियों से करेंगे सीधा मुकाबला
44 सप्ताह कड़ी ट्रेनिंग 4 दिन तक खाना नहीं
बस्तरिया बटालियान के जवानों को 44 सप्ताह तक गुरिल्ला युद्ध, छद्म एवं स्वल्पाहार में रहकर लड़ना सिखाया गया है। इनमें से ज्यादातर जवान जंगल के जानकार थे। ऐसे में जंगल में युद्ध के लिए विशेष रणनीति इन्हें सिखाई गई है। जवानों को युद्ध अभ्यास के लिए कई हफ्तों तक जंगल में रखा गया। जंगल में सर्च ऑपरेशन की ट्रेनिंग के लिए जवानों को दो से चार दिनों तक बिना भोजन के ही भेजा जाता था। यहां उन्हें जंगली फलों और नदी नालों के पानी का उपयोग कैसे करना है, यह सिखाया गया। इसके अलावा जवानों को बमों की पहचान और इन्हें डिफ्यूज करने के तरीके भी बताए गए।
जवानों को पेरपा चौक तक जाना था लेकिन चोलनार तक चले गए, इस बीच नक्सलियों ने कर दिया ब्लास्ट
6 गाड़ियों को सुरक्षा देने गए थे किरंदुल थाने से सिर्फ सात जवान
प्रदीप गौतम/संजीवदास/रामकृष्ण बैरागी|नकुलनार/किरंदुल
दंतेवाड़ा जिले के चोलनार में नक्सली ब्लास्ट में सात जवानों के शहीद होने के दूसरे दिन कई बड़े खुलासे हुए हैं। घटना से पहले जवानों से लेकर अफसरों तक ने जमकर लापरवाही बरतते हुए कुछ सामान्य गाइड लाइन का ही पालन नहीं किया। जिस सड़क पर नक्सली एंटी लैंड माइन और किरंदुल थाने की एक गाड़ी पहले भी उड़ा चुके थे उसी इलाके में जवानों को एसओपी का पालन करवाए बिना निकाल दिया गया। बताया जा रहा है कि सड़क निर्माण के मटेरियल की सप्लाई के लिए करीब 6 गाड़ियां आई थीं।
इन गाड़ियों की सुरक्षा के लिए सिर्फ 6 जवानों को किरंदुल से रवाना किया गया था और इन्हें कोई बैकअप या सपोर्टिंग पार्टी नहीं दी गई थी। जबकि चोलनार एसटीएफ की पार्टी पहले से मौजूद थी लेकिन उसे भी सुरक्षा में नहीं लगाया गया था। इसके अलावा जवानों को गाड़ियों को सुरक्षा देने के लिए सिर्फ पेरपा चौक तक जाने का आदेश दिया गया था जबकि जवान इससे कहीं आगे निकलते हुए चोलनार तक पहुंच गए। इन दो बड़ी चूक का फायदा नक्सलियों ने उठाया। इस पूरे घटनाक्रम में एक घंटे से ज्यादा समय तक नक्सलियों ने जवानों को टारगेट में रखा और मौका मिलते ही ब्लास्ट कर उनकी एसयूवी गाड़ी उड़ा दी।
किरंदुल थाना प्रभारी जेपी गुप्ता ने बताया कि जवानों को पेरपा चौक तक ही जाने कहा गया था जवान चोलनार तक चले गए थे जिसमें इनको एक घंटे से भी अधिक का समय लग गया और इस बीच नक्सलियों को पूरा समय मिल गया। इधर पूरे मामले पर चर्चा करते हुए एसडीओपी धीरेंद्र पटेल ने बताया कि यह पहला मौका था जब जवान किसी लग्जरी गाड़ी में चोलनार तक गए हों।
नकुलनार। इसी पेड़ के सहारे एक्सयूवी को बनाया टारगेट।
आम के पेड़ के नीचे ब्लास्ट के लिए छोटा से गड्ढा खोदकर रखा गया था।
नकुलनार। सोमवार को नाले में सर्च ऑपरेशन चलाया गया।