श्रुति साडाेलिकर ने जीवंत किया 1885 के दौर का राग उमा तिलक
शास्त्रीय गायिका श्रुति साडाेलिकर काटकर का कहना है कि फिल्माें में गाना कभी भी प्राथमिकता में नहीं रहा। हालांकि मेरे पिता अाैर गुरु वामन राॅव साडाेलिकर मराठी रंगमंच के कलाकार थे। श्रुति ने ये बात शनिवार काे स्पिकमैके, टूरिज्म डिपार्टमेंट अाैर जेडीए की अाेर से अायाेजित अपने कार्यक्रम से पहले पत्रकाराें से बातचीत में कही।
फ्यूजन का तरीका गलत
उन्हाेंने कहा कि हम सहिष्णु लाेग हैं, अच्छी चीज काे अपनाने में हिचकिचाते नहीं हैं। यही वजह रही कि हमारे शास्त्रीय संगीत में दूसरी संगीत शैलियाें की शास्त्रगत बातें शामिल हैं। लेकिन अाज फ्यूजन के नाम पर जिस तरह का शाेर शराबा वाला संगीत पराेसा जा रहा है वाे सही नहीं है।
गाया साै साल पुराना राग
मुझे मेरे गुरु उस्ताद अजीमुद्दीन खां साहेब ने बताया था कि 1885 में नेपाल के राजा काे अनिद्रा की बीमारी हाे गई। उन्हाेंने जयपुर घराने के प्रवर्तक उस्ताद अल्लाहदिया खां से कहा कि एेसी कोई संगीत रचना सुनाइए जिसे सुनकर नींद अा जाए। उन्होंने राग दुर्गा अाैर तिलक कामाेद के स्वराें काे मिलाकर राग उमा तिलक की रचना की और राजा काे ये राग सुनकर नींद अा गई। इसके बाद इस राग काे किसी संगीतज्ञ ने नहीं गाया। मैंने अभी तीन साल पहले इस राग काे तैयार किया।
शनिवार शाम काे सेंट्रल पार्क में हुए कार्यक्रम की शुरुआत श्रुति साडाेलिकर ने मारवा थाट के राग पूरिया से की। ‘लाज अावत कैसे मिलूं पिया संग’ बंदिश के माध्यम से उन्हाेंने राग स्वर तीव्र मध्यम अाैर काेमल रिषभ के प्रभाव काे कायम किया।