फिल्म दर फिल्म खुलती है बनारस टॉकीज की कहानी
हिंदी साहित्य के पाठक कम हो रहे हैं क्योंकि साहित्यकार ये सोच कर लिख रहे हैं कि उसे सवा सौ करोड़ भारतीय पढ़ेंगे। सबसे जरूरी है कि लेखक अपने टारगेट ग्रुप को तय करें और उसी की रुचि का साहित्य लिखें। युवा लेखक सत्य व्यास शनिवार को कलम संवाद सीरीज में बनारस टॉकीज को लेकर साहित्य प्रेमियों से रूबरू हुए। सेशन के दौरान उन्होंने इस किताब से जुड़े रोचक अनुभवों पर चर्चा की। चूंकि बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी को केन्द्र में रख कर इसे लिखा गया है तो इस नॉवल की भाषा भी बीएचयू के स्टूडेंट्स की ही है। इसका कुछ हिस्सा इंग्लिश में भी लिखा गया है। फिल्म दर फिल्म खुलती है बनारस टॉकीज की कहानी। हॉस्टल लाइफ की हकीकत इस किताब में व्यावहारिक रूप से दिखाई देगी। यही वजह थी कि मैंने दीदी को बोला कि कुछ भी हो ये किताब पापा तक नहीं पहुंचनी चाहिए। पापा की प्रतिक्रिया थी कि ये किताब पढ़ कर लगा जैसे चेतन भगत और काशीनाथ सिंह को एक साथ घोट दिया गया हो, लेकिन अच्छा लिखा है। वहीं मां से उन्होंने कहा कि मुझे चिंता है कि ये लड़का नौकरी ना छोड़ दे।
84 पर किताब लिख कर खुद को परखना चाहता हूं
बनारस टॉकीज के अलग पाठक है। मैं ऐसे नॉवल भी लिखना चाहता हूं जो गंभीर मुद्दे पर हो। मैंने 1984 के सिख दंगों पर लिखना शुरू किया है। ये मेरे लिए एक चैलेंज है कि क्या मैं सीरियस नॉवल भी लिख सकता हूं।
विचार फिसल जाने से पहले डायरी में लिख डालें
मैं नये लेखकों को यही सुझाना चाहूंगा कि जब भी दिमाग में कोई विचार या क्रिएटिव आइडिया आए उसे डायरी में लिखें। मैंने बनारस टॉकीज को ऐसे ही लिखा है। हॉस्टल में जो भी कुछ मैंने देखा उसे डायरी में लिख लिया करता था। जैसे मेरी किताब में ऐसा पात्र है जिनका नाम बदल कर मैंने राम नारायण रखा है। वो अक्सर बोलते थे कि मां-बाप ने इतना बड़ा नाम रखा है कि रिजर्वेशन फॉर्म भरते हैं तो नाम बाहर निकल जाता है। ऐसे रोचक और असली किस्से मेरी किताब में शामिल होते गए।
इडियट का मतलब आई डू इश्क ओनली तुमसे
यूं तो बनारस टॉकीज के चैप्टर के नाम 2005 तक की बॉलीवुड फिल्मों पर हैं। मेरे समय में बीएचयू में इंग्लिश के ऐसे शब्दों का भी इस्तेमाल हुआ करता था जिनका अर्थ असल से कुछ अलग होता था। जैसे कि इडियट का मतलब है आई डू इश्क ओनली तुमसे।