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हर घर में बनता था पुरोदाश, राजपरिवारों के खास व्यंजनों पर लगता था स्वर्ण भस्म
बेशक आज व्यंजन और सब्जियों में ढेरों वैरायटी आ गई है, लेकिन रजवाड़ों के समय खासकर 100 साल पहले भी जयपुर के हर घर में खास तरह के व्यंजन बनते थे जिनमें वनस्पति, देशी घी का भरपूर इस्तेमाल होता था। वर्ल्ड हेरिटेज डे पर हमने खान-पान में भी पुराने जायकों की तलाश की। पेश है एक रिपोर्ट:
आमेर की गूंजी को मान सकते हैं हैरिटेज डिश
वर्तमान में मिलने वाली आमेर की गूंजी को हैरिटेज डिश के रूप में देखा जा सकता है। यह राजा-महाराजाओं के समय से बनाई जाती रही है। इसे एक से ज्यादा शेप में तैयार किया जाता है। यह आमेर शिला माता के मंदिर में प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती है।
वनस्पतियों से बनता था सोमरस, सोगरा भी खास
सोम की लताओं से सोमरस बनता था। इसे शहद मिक्स कर बनाया जाता था। शहद से बहुत सी डिशेज बनाई जाती थीं, जिसमें वनस्पतियों को यूज किया जाता था। एक्सपर्ट बताते हैं, इनमें से कई चीजों को खाने से टूटी हड्डियां और नसों की परेशानी ठीक हो जाती थी। इसे प्रिजर्व किए गए शहद से तैयार किया जाता था। इसी तरह राबड़ी जैसी डिश सोगरा पुराने जमाने से बन रही है। इसमें देशी घी का खास इस्तेमाल होता है।
(जैसा देवर्षि कलानाथ शास्त्री और शेफ गजराज सिंह ने बताया)
गेहूं का पुरोदाश और बादशाही बर्फी
पहले देवताओं के नाम से व्यंजन होते थे। अच्छी वर्षा की कामना के लिए इंद्रदेव के लिए गेहूं की चीजें बनती थीं। पुरोदाश गेहूं का बनता था। गेहूं के साथ अन्य चीजें मिक्स करके इसे तैयार किया जाता था। इसका रूप हलवे जैसा होता था तो ठोस शेप में भी इसे तैयार किया जा सकता था। वहीं राजपरिवार में सोने की भस्म डिशेज में लगाई जाती थी और सोने-चांदी के बर्तनों में उन्हें खाया जाता था। क्योंकि माना जाता है कि सोने की भस्म सेहत के लिए फायदेमंद होती है। साथ ही शाही जगहों पर मेवे से ज्यादा चीजें तैयार की जाती थीं, जो आज भी बनाई जा रही हैं। इसमें बादशाही खाना शाख की बर्फी खास थी, जो आज भी कुछ जगहों पर तैयार की जाती थी। इसमें मेवा, बादाम, पिस्ता, काजू के साथ देशी घी इस्तेमाल किया जाता है। ये 200 से 300 रुपए का सिर्फ एक पीस उपलब्ध होता है। ऐसी ही जयपुर की मेवे और फ्रूट्स की खीर खास है, जो पुराने जमाने से बनाई जा रही है।