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- ‘लफ्ज’ की शृंखला में शायर फरहत एहसास ने अपनी किताब ‘कश्का खींचा दैर में बैठा’ पर बातचीत की
‘लफ्ज’ की शृंखला में शायर फरहत एहसास ने अपनी किताब ‘कश्का खींचा दैर में बैठा’ पर बातचीत की
बदन और रूह में झगड़ा पड़ा है कि हिस्सा इश्क में किस का बड़ा है। हुजूम-ए-गिर्या (बहुत ज्यादा रोना) से हूं दर-ब-दर मैं कि घर में सर तलक पानी खड़ा है.. इन पंक्तियों के साथ यूपी में जन्मे मशहूर शायर फरहत एहसास ने शेर-ओ-शायरी को अपने लफ्जों के साथ तराशा। उन्होंने बताया, 17 की उम्र में पहली शायरी लिखी। तभी लगा मेरे अंदर शब्दों का कारवां है जिसे मैं शेर में तराश सकता हूं। मौका था शुक्रवार को प्रभा खेतान फाउंडेशन और रेख्ता फाउंडेशन के सहयोग से होटल हिल्टन में आयोजित लफ्ज की पहली श्रृंखला का। उर्दू व हिंदी के कवि लोकेश कुमार सिंह साहिल के साथ एहसास ने अपनी जिंदगी और किताब ‘कश्का खींचा दैर में बैठा...’ पर बातचीत की।
शायरी में रूह मेटाफर बनकर रह गई
एहसास कहते हैं, जिस्म के रास्ते बड़ी दुश्वारियां पैदा कर दी गई हैं। जिस्म को जीन्स के साथ जोड़ दिया गया है। रूह एक कंडीशन है, जो अजर- अमर है। मगर इंसान को जीन्स से जोड़ दिया है। वो मेटाफर बन गया है। शायरी में शायर रूह का मेटाफर के रूप में इस्तेमाल करने लगा है। जब हम किसी से मुहब्बत करते हैं, पहली दफा उसके जिस्म से इश्क करते हैं। फिर आगे जाकर हमारी संवेदनाएं उनसे जुड़ती हैं। और फिर इंसान अपनी मुहब्बत को अपने तरीके से इंटरप्रेट करता है।
लड़खड़ाती राजनीति को साहित्य संभालेगा
मॉडरेटर लोकेश कुमार सिंह ने एक किस्सा बताया, लाल किले पर जब कवि सम्मेलन हो रहा था। स्टेज की सीढ़ी काफी ऊंची थी। ऐसे में पंडित जवाहर लाल नेहरू लडख़ड़ा गए। कवि दिनकर ठीक उनके पीछे थे। दिनकर ने उन्हें संभालते हुए कहा, देश की राजनीति जब-जब लड़खड़ाएगी, साहित्य उसको संभालेगा।
जिस्म भी एक मौसिकी
शायरी हर वक्त चलती रहती है। वो मुसलसल है। मेरे लिए खुद को इंटरप्रेट करने का तरीका है। वो सारे एलीमेंट्स जिनसे मेरा जिस्म बना है, वो किसी बनी-बनाई शक्ल में नहीं जाते हैं। जिस्म का बहुत बड़ा समुद्र है, जिसे हम मौसिकी के चाक पर रखकर चलाते हैं। उन्होंने उर्दू की स्थिति के बारे में कहा, देश की आजादी के 20-25 सालों बाद उर्दू जुबान के साथ ज्यादती शुरू हुई। खासकर इसलिए क्योंकि उस जमाने के शायर मुशायरों में चिल्ला-चिल्ला कर, चेहरा बिगाड़ कर शायरी करने लगे। जैसे सब्जी बेचने वाले चिल्ला कर सब्जियां बेचता है। एक दौर वो भी आया जब भाषा का बड़े पैमाने पर कॉमर्शियलाइजेशन हुआ। डिमांड हुई तो सप्लाई होने लगी। भाषा का स्वरूप बदलकर उसे तोड़-मरोड़कर पेश किया। मानो एक तरह का मुस्लिम अफेयर शुरू हो गया हो। मगर पिछले 10 सालों में माहौल बदला है। अब पढ़े-लिखे आईआईटीयन उर्दू जुबां के साथ जुड़ रहे हैं।
मुसाफिर हो तो निकलो पांव में आंखें लगाकर...
शायर की कलम से...
- मौत मेरा इक जरा सा काम कर, जिंदगी की धूप में कुछ शाम कर।
- शक हुआ है कि मैं अंधा तो नहीं, साफ जब भी नजर आया मंजर
- गुले खुदामदा रबते चमन कहां से लाएं
- सनद में अपनी हम अपना वतन कहां से लाएं...
- मुसाफिर हो तो निकलो पांव में आंखें लगाकर, किसी भी हमसफर से रास्ता क्यों मांगते हो