इंसान सभी मखलूकों में अशरफ है, वह ख्वाहिशों को काबू कर सकता है। ख्वाहिशों को काबू करने के लिए तीन चीजें जरूरी हैं, पहला सभी लज्जत व शहवतों से रोका जाए, दूसरा इबादत का बोझ डाला जाए और तीसरा हर वक्त खुदा से मदद चाहे। यही तीनों बातें रोजे में मुकम्मल होती हैं। भूखे इंसान के दुख का सही अहसास भी रोजे से पैदा होता है। - खालिद उस्मानी, चीफ काजी, राजस्थान
रोजे का मतलब है, सुबह पो फटने (सूरज उगने से करीब डेढ़ घंटा पहले) से लेकर सूरज छिपने तक खाने-पीने व संभाेग से रुका जाए। इसके अलावा अगरबत्ती का धुआं, दवा, पानी की भाप मुंह या नाक में दाखिल होने, कुल्ली करते समय हलक में पानी जाने, नाक में दवा डालने, हुक्का-बीड़ी-सिगरेट पीने, मुंह में कागज या घास चले जाने से भी रोजा टूट जाता है।
- मुफ्ती मुहम्मद जाकिर, मुफ्ती शहर जयपुर
रोजे जैसा कोई अमल नहीं- एक सहाबी ने बारगाहे रिसालत में अर्ज किया, या रसूलुल्लाह सल्ल. मुझे कोई अमल बताइये। इरशाद फरमाया “फरमाया, रोजे रखा करो, इस जैसा कोई अमल नहीं’। अर्ज किया मुझे कोई और अमल बताइये। फरमाया “रोजे रखा करो, इस जैसा कोई अमल नहीं’। मैंने फिर अर्ज किया मुझे कोई और अमल बताइये। फरमाया “रोजे रखा करो, रोजे रखा करो, क्योंकि इसका कोई मिस्ल नहीं’।
- मुफ्ती अब्दुल सत्तार साहब, मुफ्ती शहर अहले सुन्नत