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महाभारत के वन पर्व के जरिए दिखाया पांडवों का देशाटन

3 वर्ष पहले
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जेकेके रंगायन में रविवार को गिरीश कर्नाड के चर्चित नाटक ‘अग्नि और बरखा’ का मंचन किया गया। केएस राजेंद्रन के निर्देशन में खेले गए इस नाटक में कलाकारों ने महाभारत के वन पर्व को जीवंत किया। कर्नाड ने मूलत: यह नाटक अपनी मातृभाषा कन्नड़ में ‘अग्नि मुत्तु मले’ नाम से लिखा था। बाद में राम गोपाल बजाज ने इसका हिंदी रूपांतरण किया। इसमें यह दर्शाया गया कि वन पर्व के दौरान देशाटन में पांडव इधर-उधर भटक रहे थे। उनकी मनोदशा कैसी थी। इसी समय उनको संत लोमश यवक्री यानी यवक्रत की गाथा सुनाते हैं। इस कथा में कई गंभीर अर्थ विद्यमान हैं। इस रूपांतरित नाटक में पारिवारिक ईर्ष्या और दूसरी घटनाओं को रोचकता के साथ प्रस्तुत किया है। इसमें एक पिता-पुत्र की ईर्ष्या को रैभ्य और परावसु के जरिए व्यक्त किया है। पिता रैभ्य अपने पुत्र से कुंठित है क्योंकि उसकी आयु अधिक होने के कारण पुत्र को महायज्ञ का मुख्य पुरोहित नियुक्त किया जाता है। इस नाटक में दूसरे कई प्रसंगों को जीवंत किया गया है।

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