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रोजे की शुरूआत हजरत आदम अलैहिस्स्लाम के जमाने से हो

3 वर्ष पहले
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रोजे की शुरूआत हजरत आदम अलैहिस्स्लाम के जमाने से हो गई थी। रिवायत से मालूम होता है कि उनके दौर में हर माह की तेरहवीं, चौदहवीं व पंद्रहवीं तारीख के रोजे फर्ज थे। यहूद व नसारा भी रोजे रखते थे। पारसियों में रोजा बेहतरीन इबादत समझा जाता है। गर्ज आदम अलैहिस्स्लाम से लेकर पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब तक हर कौम और मिल्लत में रोजे का वजूद मिलता है। - खालिद उस्मानी, चीफ काजी, राजस्थान

रमजान मुबारक में दिलों की सफाई जरूरी है। जिसके दिल में कीना, हसद, बुग्ज, अदावत, खोट व मेल जमा हो, उस पर माहे मुबारक का नूर नहीं उतरता है। इस महीने में दिल, जुबान व अमल से अहतिराम करना भी जरूरी है। कुछ लोग सरे आम खाते-पीते हैं, ये नामुनासिब है। इसलिए इस महीने में सखावत, बख्शिश, मेहमान नवाजी आम होनी चाहिए। - मुफ्ती मुहम्मद जाकिर, मुफ्ती शहर जयपुर

हजारों लोग जहन्नम से आजाद किए जाते हैं- हुजूर सल्ल. ने फरमाया कि जब रमजानुल मुबारक की पहली रात होती है तो अल्लाह अपनी मखलूक की तरफ नजर करता है, जब किसी बंदे की तरफ नजर फरमाता है, उसे कभी अजान नहीं देता। उस रात अल्लाह तआला के हुक्म से हजारों लोग जहन्नम से आजाद कर दिए जाते हैं। -मुफ्ती अब्दुल सत्तार साहब, मुफ्ती शहर अहले सुन्नत

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