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ब्राह्मण महासभा : आपत्ति अंबेडकर से नहीं, बोर्ड मीटिंग बिना नामकरण कैसे कर दिया
महेश नगर 80 फिट रोड पर जेडीए पार्क के नामकरण का मामला तूल पकड़ गया है। पार्क का नाम परशुराम या अंबेडकर में से किसके नाम पर हो, इसके लिए जेडीए, नगर निगम और ब्राह्मण महासभा आमने-सामने हैं। ब्राह्मण महासभा का दावा है कि उन्होंने एक साल पहले नगर निगम को पत्र लिखकर इस पार्क का नाम भगवान परशुराम के नाम पर किए जाने के लिए आवेदन किया था। इधर, निगम का तर्क है कि स्थानीय विधायक कालीचरण सराफ और वार्ड नंबर 57 के पार्षद बाबूलाल दातोनिया की अनुशंषा पर इस पार्क का नाम डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम पर किया गया है।
पार्षद ने कहा, मंत्री ने सिफारिश की, तब रखा नाम : मेयर
नगर निगम उद्देश्य किसी भी समाज की भावनाओं को आहत करना नहीं है। हमने क्षेत्रीय विधायक व मंत्री कालीचरण सराफ, स्थानीय पार्षद अाैर जेडीए की अनुशंसा के आधार पर पार्क का नाम डॉ भीमराव अंबेडकर करने का निर्णय लिया है।
महेश नगर के जेडीए पार्क पर ब्राह्मण महासभा और नगर निगम आमने-सामने
हमें अंबेडकर पर आपत्ति नहीं पर निगम का तरीका गलत : ब्राह्मण महासभा
अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा युवा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष विपिन शर्मा पार्क का नाम भगवान परशुराम पार्क रखने के लिए हमने मुख्यमंत्री कार्यालय एवं यूडीएच मंत्री श्रीचंद कृपलानी को एक वर्ष पहले पहले ही प्रार्थना पत्र दिया था। नियमानुसार नगर निगम की बोर्ड मीटिंग में नामकरण के प्रस्ताव पर सर्वसम्मति होने पर ही नाम बदला जाता। लेकिन मेयर और अधिकारियों ने अपने स्तर पर ही पार्क का नाम अंबेडकर पार्क रखने का निर्णय कर लिया जो नियमों के खिलाफ है। पार्क का नाम अंबेडकर रखने पर हमें कोई आपत्ति नहीं है, पर निगम का तरीका गलत है। निगम ने दूसरे समाज की भावनाओं का ध्यान नहीं रखा।
नगर निगम : विधायक-पार्षद और जेडीए की िसफारिश पर पार्क का नाम अंबेडकर रखा
यह है मामला : समग्र समाज सेवा समिति महेशनगर की ओर से जयपुर नगर निगम और चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री कालीचरण सराफ को पत्र लिखकर महेश नगर स्थित जेडीए पार्क का नाम डॉ. भीमराव अंबेडकर पार्क रखने का प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया गया था। इसके आधार पर नगर निगम ने पार्क का नाम भीमराव अंबेडकर रखने का निर्णय किया।
भास्कर विचार
पार्क जनसुविधाओं के लिए हैं, न कि राजनीतिक के केंद्र। ऐसे में इनके नाम पर राजनीति बंद होनी चाहिए। वर्ग विशेष की भावनाओं के आधार पर नामकरण किए जाने से वहां के स्थानीय निवासियों में सामाजिक सौहार्द बिगड़ सकता है। सरकार और जातीय संगठनों को भी नामकरण की राजनीति त्याग कर आपसी सद्भाव की इस मुहिम का साक्षी बनना चाहिए।