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बचपन बचाने की सिर्फ बातें, सख्ती दिखानी है तो विशेष कोर्ट बनाओ : हाईकोर्ट

3 वर्ष पहले
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हाईकोर्ट ने प्रदेश के हर जिले में बच्चों के खिलाफ होने वाले लैंगिक अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष कोर्ट का गठन नहीं होने के मामले में शुक्रवार को कहा कि बच्चों के लिए बात तो हो रही है लेकिन काम नहीं हो रहा, उनके लिए अलग से विशेष कोर्ट बननी चाहिए। इन कोर्ट के निर्माण के दौरान भविष्य का भी ध्यान रखा जाना चाहिए ताकि आमजन के रुपए का सदुपयोग हो सके। अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वे पोक्सो कोर्ट के संबंध में रोडमैप पेश करें। न्यायाधीश एम.एन.भंडारी व डीसी सोमानी की खंडपीठ ने यह अंतरिम निर्देश शुक्रवार को राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की याचिका पर दिया। अदालती आदेश के पालन में मुख्य सचिव एनसी गोयल व श्रम सचिव टी.रविकांत अदालत में पेश हुए। मुख्य सचिव ने कहा कि स्टेट कोर्ट को हाईकोर्ट प्रशासन को सौंपने के संबंध में मामला प्रक्रियाधीन है। वे आगामी सुनवाई पर यह बता देंगे कि स्टेट कोर्ट राज्य सरकार रखेगी या हाईकोर्ट प्रशासन को देगी। इस पर अदालत ने मामले की सुनवाई 11 मई तय की। गौरतलब है कि याचिका में पोक्सो की विशेष कोर्ट नहीं होने को चुनौती देते हुए कहा था कि एक्ट में प्रावधान है कि बच्चों की पहचान सार्वजनिक नहीं हो और इन मामलों की अलग से कोर्ट हो। लेकिन न तो हर जिले में ये कोर्ट हैं और न ही उनमें स्पेशल पीपी है। इसलिए इन कोर्ट को परिसर में एकांत जगह में बनाया जाए।

स्टाफ लगाओ नहीं तो श्रम सचिव का स्टाफ हटा देंगे

अदालत ने श्रम सचिव टी. रविकांत से कहा- कोटा के श्रम न्यायालय के जज अच्छा काम कर रहे हैं और उन्होंने ज्यादा मुकदमों का निपटारा भी किया है। उन्होंने स्टाफ की कमी के संबंध में जाे पत्र लिखा है उसका जवाब ही नहीं दिया। उनके पास कंप्यूटर तक नहीं है। सरकार के पास यह रिकार्ड रहता है कि कौनसा कर्मचारी कब रिटायर्ड हो रहा है। सरकार कर्मचारियों के रिटायरमेंट से पहले उनके पदों पर नियुक्ति क्यों नहीं करती? श्रम सचिव सात दिन में श्रम न्यायालयों में स्टाफ मुहैया कराएं अन्यथा उनका स्टाफ हटा दिया जाएगा।

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