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\"अतृप्त आत्माएं\' में दिखाई दी इंसान की विकृत मनोवृत्ति

3 वर्ष पहले
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‘संतोषी सदासुखी’ कहावत का आज के दौर में महत्व नहीं रहा, जिसे देखो अतृप्त दिखाई देता है। इंसान की इसी प्रवृत्ति ने उसकी मनोवृत्ति को विकृत कर दिया है। इंसानियत, नैतिकता, विनम्रता जमींदोज कर दी है। आज पैसे के लिए कोई भी किसी भी हद तक जा सकता है। कुछ ऐसे ही विचारों काे लेकर गुरुवार काे रवींद्र मंच पर नाटक ‘अतृप्त आत्माएं’ का मंचन किया गया। केके काेहली लिखित इस नाटक का निर्देशन अतुल श्रीवास्तव ने किया। नाटक की कहानी मुख्यतः राजकीय अधिकारी रामदयाल एवं राजनेता भैय्याजी के कुकर्मों पर आधारित है, जिनके द्वारा भ्रष्टाचार किया जाता है। भ्रष्टाचार भी इतना कि उनकी आत्मा तृप्त ही नहीं होती। नाटक कला एवं संस्कृति विभाग के सहयाेग से अनुपम रंग थिएटर सोसायटी के बैनर पर खेला गया।

इशिता गलहोत्रा, नरेन्द्र सिंह बबल, महेश महावर, युवराज गुप्ता, शंकर पुरोहित, रमन पारीक, हेमंत जांगिड़, अंकित शर्मा, भारत कौशिक ने अभिनय किया

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