इस्लाम के अरकान में सबसे पहले नमाज फर्ज हुई, फिर जब पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब मदीना मुनव्वरा तशरीफ ले आए तो बहुत से हुक्म आए। उनमें से एक रोजे का है। रोजे की तकलीफ चूंकि नफ्स पर शाक से गुजरती है, इसलिए उसको फर्जों में तीसरा दरजा दिया गया है। - खालिद उस्मानी, चीफ काजी, राजस्थान
कुरआन में सूरह बकरा आयत 183 में रोजों के फर्ज होने का हुक्म दिया गया है। यह एक जिस्मानी इबादत है, इससे इंसान में तकवा, परहेजगारी और बुरे कामों से बचने की प्रेक्टिस होती है। पहले आशूरा यानी 10 मोहर्रम का रोजा जरूरी था, बाद में रमजान के पूरे महीने के रोजे फर्ज किए गए।
- मुफ्ती मुहम्मद जाकिर, मुफ्ती शहर जयपुर
नूर का ताज- हुजूर सल्ल. ने इरशाद फरमाया कि जो कुरआन पढ़ेगा, उसकी तालीम हासिल करेगा और उसके मुताबिक अमल करेगा, उसके वालिदेन को कयामत के दिन नूर का एक ताज पहनाया जाएगा। इस ताज की रोशनी आफताब यानी सूरज की रोशनी की तरह होगी।
- मुफ्ती अब्दुल सत्तार साहब, मुफ्ती शहर अहले सुन्नत